Srishti Khanda Extracted Page 366
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-366
Sanskrit Original
प्रवृत्तासु पुराणासु धर्मसंबंधिनीषु च । कथासु भीमसेनेन परिपृष्टः प्रतापवान्॥१३॥ त्वया पृष्टस्य धर्मस्य वक्ष्यत्यस्य च भेददूक् । भविता स तदा ब्रह्मन्कर्ता चैव वृकोदरः ॥१४॥ प्रवर्तकोस्य धर्मस्य पांडुसूनु र्महाबलः । यस्य तीक्ष्णो वृको नाम जठरे हव्यवाहनः ॥१५॥ संभाव्यते सधर्मात्मा तेन चासौ वृकोदरः । अतीव स्वादशीलश्च नागायुतबलो महान् ॥१६॥ घार्मिकस्याप्यशक्तस्य तीव्राप्रित्वादुपोषणे । इदं व्रतमशेषाणां व्रतानामधिकं यतः ॥१७॥ कथयिष्यति विश्वात्मा वासुदेवो जगहुरुः । अशेषयज्ञफलदमशेषाघविनाशनम् ॥१८॥ अशेषदुष्टशमनमशेषसुरपूजितम् । पवित्राणां पवित्रं यन्मङ्गलानां च मङ्गलम् ॥ भविष्यं च भविष्याणां पुराणानां पुरातनम् ॥९९॥ वासुदेव उवाच यद्यष्टमी चतुर्दश्यो द्वादशीषु च भारत। अन्येष्वपि दिनक्षेषु न शक्तस्त्वमुपोषितुम्॥२०॥ ततस्त्वफ्र्यामिमां भीम तिथिं पापप्रणाशिनीम्। उपोष्य विधिनानेन गच्छविष्णोः परं पदम् ॥२१॥ माघमासस्य दशमी यदाशुक्ला भवेत्तदा । घृतेनाभ्यंजनं कृत्वा तिलैः स्नानं समाचरेत् ॥२२॥ तथैव विष्णुमभ्यर्चेन्नमो नारायणाय च । कृष्णाय पादौ संपूज्य शिरः कृष्णात्मनेति च॥२३॥ वैकुण्ठायेति वैकण्ठमुरः श्रीवत्सधारिणे। शंखिने गदिने चैव चक्रिणे वरदाय वै ॥२४॥ सर्व नारायणन्त्वेवं संपूज्यावाहनक्रमात् । दामोदरायेत्युदरं कटिं पञ्चजनायवै ॥२५॥ ऊरू सौभाग्यनाथाय जानुनी भूतधारिणे । नमो नीलाय वै जंघे पादौ विश्वभुजे पुनः॥२६॥ दक्षिणा वाले यज्ञों को करने वाले अनेक वृष्णिवंशियों कुरुवंशियों तथा देवगन्धर्वो के साथ बैठे हुए रहेंगे ॥१०-१२॥ जब धर्म संबन्धिनी चर्चा होती रहेगी, उस समय प्रतापी श्रीभगवान् से भीमसेन प्रश्न करेंगे ।॥१३॥ उस समय आपके द्वारा प्रश्न और उसके भेदों को जानने वाले श्रीभगवान् बतलायेंगे ॥१४॥ इस धर्म का प्रवर्तन करने वाले महाबलवान् पाण्डु के पुत्र भीम होंगे । उनके पेट में वृक नामक तीक्ष्ण अग्नि होगी ॥१५॥ वे धर्मात्मा वृकोदर भीम से उस ब्रत को कहेंगे । भीम अत्यधिक स्वाद लेने वाले तथा दश हजार हाथियों के बल से युक्त होने के कारण॥ १६॥ तथा जाठराग्नि के अत्यन्त तीव्र होने के कारण धार्मिक भी-उपवास नहीं कर पायेंगे । उनसे विश्वात्मा जगटुरु भगवान् वासुदेव कहेंगे कि जिसे में बतला रहा हूँ वह सभी ब्रतौं में श्रेष्ठ है ॥१७॥ यह सम्पूर्ण दुष्टों को शान्त करने वाला, समस्त यज्ञों का फल प्रदान करने वाला, समस्त प्रापों को विनष्ट करने वाला सभी देवताओं से पृजित, समस्त पवित्र व्रतं से पवित्र, सर्वाधिक मङ्गलमय, भविष्य कालीन व्रतों से बढकर भविष्यत् कालिक तथा प्राचीन व्रतों से भी प्राचीन व्रत है ॥१८-१९॥ भगवान् वासुदेव ने कहा-- हे भारत ! यदि आप, अष्टमी, चतुर्दशी तथा द्रादशी इनके अतिरिक्त दूसरे दिन अथवा नक्षत्रों में उपवास नहीं कर सकते हैं, तो फिर ॥२०॥ यह (द्वादशी) तिथि पापों को विनष्ट करने वाले ब्रतों में श्रेष्ठ हैं, इस तिथि में उपवास करके श्रीभगवान् के परम पद को प्राप्त कर लें ॥२१॥ जब माघ मास के शुक्ल पक्ष को द्वादशी तिथि आये तो सम्पूर्ण शरीर में घी मलकर तिल मिश्रित जल से स्नान करे ॥२२॥ उसके बाद भगवान् विष्णु की पूजा ॐ नमो नारायणाय इस मन्त्र से करे कृष्णाय नमः इस मन्त्र से उनके चरणों की पूजा करे, कृष्णात्मने नमः इस मन्त्र से उनके शिर की पूजा करे॥२३॥ वैकुण्ठाय नमः से वैकुण्ठ की पूजा करे और श्रीवत्सधारिणे नमः इस मन्त्र से वक्षःस्थल की पूजा करे। फिर शंखिने नमः गदिने नमः, चक्रिणे नम, वरदाय नमः ।।२४॥ सर्व वै नारायणम् इसतरह से पूजन
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