Srishti Khanda Extracted Page 365

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-365

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Sanskrit Original

तेइसवाँ अध्याय भीष्म उवाच वैण्णवा ये तु वै धर्मा यान् रुद्रः प्रोक्तवानिह । तान्मे कथय विप्रेंद्र कीदृशास्ते फलं तु किम्॥१॥ पुलस्त्य उवाच पुरा रथंतरे कल्पे परिपृष्टो महात्मना । मंदरस्थो महादेवः पिनाकी ब्रह्मणा स्वयम् ॥२॥ कथमारोग्यमैश्वर्यमनंतमममरेश्वर । अल्पेन तपसा देव भवेन्मोक्षः सदानृणाम् ॥३॥ कि तज्ज्ञानं महादेव त्वत्प्रसादादधोक्षज। अल्पकेनापि तपसा महाफलमिहोच्यते ॥४॥ इति पृष्टस्सविश्वात्मा ब्रह्मणा लोकभावनः। उमापतिरुवाचेदं मनसः प्रीतिकारकम् ॥५॥ ईश्वर उवाच अस्माद्रथंतरात्कल्पाद्धयो विंशतिमो यदा। वाराहो भविता कल्पस्तदामन्वंतरे शुभे ॥६॥ वैवस्वताख्ये संप्राप्ते सप्तमे सप्तलोकधृक। द्वापाराख्यं युगं तस्त्मिसप्तविंशतिमं यदा ॥७॥ तस्यांते तु महातेजा वासुदेवो जनार्दनः । भारावतरणार्थाय त्रिधा विष्णुर्भविष्यति ॥८॥ द्वैपायनऋषिस्तत्र रौहिणेयोऽथ केशवः । कंसारिः केशिमथनः केशवः क्लेशनाशनः ॥९॥ पुरी द्वारावतीं नाम सांप्रतं या कुशस्थली । दिव्यानुभावसंयुक्तामधिवासाय शार्ङ्गिणः ॥१०॥ त्वष्टा तदाज्ञया ब्रह्मन्करिष्यति जगत्पतेः। तस्यां कदाचिदासीनः सभायां सोऽमितद्युतिः ॥११॥ भार्याभि बृष्णिविद्दद्धि भूरिभि भूरिदक्षिणैः । कुरुभि देवगंधर्वैरन्वितः कैटभार्दनः ॥१२॥ वैष्णव धर्म का वर्णन, भीम द्वारा वैष्णव धर्म का प्रवर्तन, माघ शुक्ल पक्ष में होने वाली भीमद्वादशीब्रत का विधान, वर्णाश्रमो की उत्पत्ति, वेश्या व्रत का विधान और उसका विस्तृत वर्णन भीष्मजी ने कहा-- जो वैष्णव व्रत है, तथा जिनका रुद्र ने उपदेश किया है, हे विप्र ! आप हमें उन्हीं ब्रतों को बतलाइये । वे व्रत कौन हैं ? तथा उनका फल क्या है ?॥१॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- प्राचीन काल में रथन्तर कल्प में ब्रह्माजी ने रुद्र से पूछा-- उस समय महादेव शङ्करजी मन्दाराचल पर्वत पर थे । हे अमरेश्वर ! हे देव ! थोड़ी सी ही तपस्या के द्वारा आरोग्य तथा अनन्त ऐश्वर्य एवं मोक्ष मनुष्यों को कैसे प्राप्त हो सकता है ? हे महादेव ! हे अद्योक्षज ! आपकी कृपा से प्राप्त होमै वाला वह कोन सा ज्ञान है जिसके कारण थोड़ी सी भी तपस्या से महान् फल की प्राप्ति होती है ।।४॥ इस तरह से ब्रह्माजी के द्वारा पूछे जाने पर, लोकों पर कृपा करने वाले विश्वात्मा उमापति ने मन को प्रसन्न करने वाली वाणी कहा ॥५॥ ईश्वर (शङ्करजी) ने कहा--- इस रथन्तर कल्प के बाद बीसवाँ वाराह कल्प होगा । उसके मङ्गलमय ॥६॥ सातवें वैवस्वत मन्वन्तर के सताइसवें द्वापर में सातो लोकों को धारण करने वाले महातेजस्वी जनार्दन वासुदेव, पृथिवी का भार उतारने के लिए तीन रूपों में पृथिवी पर अवतीर्ण होंगे ॥७-८॥ वे एक रूप से द्वैपायन ऋषि होंगे, दूसरे रूप से रोहिणी माता के पुत्र बलराम होंगे और तीसरे रूप में वे भगवान् श्रीकृष्ण होंगे । कंस के शत्रु, भक्तों के कष्ट को विनष्ट करने वाले केशव, केशी नामक दैत्य का वध करेंगे ॥९। इस समय जो कुशस्थली है, वही उस समय दिव्य प्रभाव से सम्पन्न शार्ङ्गधारी श्रीभगवान् की निवासस्थली द्वारावती (द्वारका) पुरी होंगी । श्रीभगवान् की आज्ञा पाकर उस नगरी का निर्माण त्वष्टा (विश्वकर्मा) करेंगे । उस नगरी में एक बार सभा में अमित कान्ति सम्पन्न कैटभारि श्रीभगवान् अपनी पत्नियों, तथा अत्यधिक

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