Srishti Khanda Extracted Page 342
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-342
Sanskrit Original
विशोकसप्तमीं तद्दतृतीयां फलसप्तमीम्। शर्करासप्तमीं कुयत्तिथा कमलसप्तमीम् ॥२१३॥ मंदारसप्तमी षष्ठीं सप्तमीं शुभसप्तमी । सर्वाः पुण्यफलाः प्रोक्ताः सर्वा देवर्षिपूजिताः॥२९४॥ विधानमासां वक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः । यदा तु शुक्लसप्तम्यामादित्यस्यदिनं भवेत् ॥२१५॥ सा तु कल्याणिनी नाम विजया च निगद्यते। प्रातर्गव्येन पयसा स्नानं नद्यां समाचरेत् ॥२१६॥ शुक्लांबरधरः पद्ममक्षतैः परिकल्पयेत्। प्राङमुखोष्टदलंमध्ये तद्वदवृत्तां च कर्णिकाम्॥२१७॥ पुष्पाक्षताद्धि्देवेशं विन्यसेत्सर्वतः क्रमात् । पूर्वेण तपनायोति मार्तडायेति वै ततः ॥२१८॥ याम्ये दिवाकरायोति विधात्र इति नैऋते । पश्चिमे वरुणायेति भास्करायेति चानिले ॥२१९॥ सौम्ये विकर्तनायेति देवायेत्यष्टमे दले । आदावंते च मध्ये च नमोस्तु परमात्मने॥२२०॥ मंत्रे तैस्समभ्यर्च्यं नमस्कारांत दापितैः। शुक्लैर्वस्रैः फलैर्भक्ष्यै ्ू पमाल्यानुलेपनैः ॥२२९॥ स्थंडिले पूजयेद्भक्त्या गुडेन लवणेन वै । ततो व्याहतिमंत्रेण विसृज्यद्विजपुंगवान् ॥२२२॥ शक्तितस्तर्पयेद्धक्त्या गुडक्षीरघृतादिभिः । तिलपात्रं हिरण्यं च ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥२२३॥ एवं नियमकृत्सुप्त्वा प्रातरुत्थाय मानवः । कृतस्नानजपो विप्रैः सहैव घृतपायसम् ॥२२४॥ भुक्त्वा च वेदविदुषि वैडालब्रतवर्जिते। घृतपात्रं सकनकं सोदकुंभं निवेदयेत् ॥२२५॥ प्रीयतामत्र भगवान्परमात्मा दिवाकरः । अनेन विधिना सर्व मासि मासि समाचरेत् ॥२२६॥ से पार करने वाला हो तथा स्वर्ग एवं आरोग्य रूपी फल को प्रदान करने वाला हो। महर्षि पुलस्त्य ने कहा-- में आपको कल्याण सप्तमी नामक सौर व्रत को बतलाता हूँ ॥२११-२१२॥ विशोक सप्तमी, दूसरी है, तीसरी फल सप्तमी, चौथी शर्करा सप्तमी, पाँचवीं कमल सप्तमी, छठी ॥२१३॥ मंदार सप्तमी और सातवीं शुभ सप्तमी ।ये सातों सप्तमियाँ देवों तथा ऋषियों से पूजित तथा पुण्यफल प्रदान करने वाली बतलायी गयी हैं ।में इन सबों के क्रमानुसार विधानों को वतलाता हूँ । जब शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि को रविवार का दिन आये ॥२१४-२१५॥ उस दिन कल्याणिनी नामकी विजया सप्तमी हाती है । उस दिन प्रातःकाल नदी में जाकर गौ के दूध से स्नान करे॥२१६॥ फिर श्वेत वस्त्र धारण करे अक्षतों के द्वारा अष्टदल कमल का निर्माण करे । उसके बीच की कर्णिका को मी वृत्ताकार होना चाहिए ।।२ १७॥ पूर्वाभिमुख होकर कमल के बीच में देवेश सूर्यनारायण की स्थापना करे । स्थापना पुष्प, अक्षत एवं जल से करनी चाहिये । उसके बाद प्रत्येक दलों में पूजा करे । पूर्वदल में तपनाय नमः इस मंत्र से, अग्नि कोणमें मार्तण्डाय नमः इस मन्त्र से, दक्षिण दल में दिवाकराय नमः से, नैऋत्य में विधात्रे नमः से, पश्चिम दिशा में वरुणाय नमः से वायव्य में भास्कराय नमः से ॥२१९॥ उत्तर दल में विकर्तनाय नमः से आठ वे ईशान में देवाय नमः इस मंत्र से स्थापना करे । मन्त्रों के आदि, मध्य तथा अत में नमोऽस्तु परमात्मने को जोड़ना चाहिए ।।२२०॥। इन्हीं मंत्रों से पूजा करके फिर इन्हीं मन्त्रों से नमस्कार करना चाहिये । उसके वाद वेदी के ऊपर श्वेत वस्त्र, फल, मिष्ठान, धूप, माला, चन्दन, गुड तथा नमक से सूर्य का पूजन करे । उसके बाद ॐ भृः, ॐ भुवः, ॐ स्वः, ॐ महः, ॐ जनः, ॐ तपः, ॐ सत्यम् इन व्याहतियों के मन्त्रों से विसर्जन करे। उसके बाद श्रेष्ठ ब्राह्मणों को॥२२१-२२२॥ अपनी शक्ति के अनुसार गुड, घी तथा दुग्ध इत्यादि से भोजन कराये। उसके बाद तिल से भरे पात्र तथा सुवर्ण का ब्राह्मण को दान दे ॥२२३॥ इस तरह से नियम का पालन करके सो जाय । फिर प्रातःकाल उठकर, स्नान करके मन्त्र आदि का जप करके ब्राह्मणों के साथ ही घृत मिश्रित खीर का मोजन करे ।।२२४।। जो पाखण्डी न हो ऐसे वैदिक विद्वान् को घी से भरे पात्र, सुवर्ण तथा जल से भरे घड़े का
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