Srishti Khanda Extracted Page 341

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-341

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Sanskrit Original

गंधमादनश्वंगे तु धनदः स्यादुदडमुख: । प्राडमुखो वेदमूर्निस्तु हंसः स्याद्विपुलाचले ॥२००॥ हैमीभवेत्सुपार्श्चे तु सुरभी दक्षिणामुखी । धान्यपर्वतवत्सर्वमावाहनमखादिकम् ॥२०९॥ कृत्वाथ गुरवे दद्यान्मध्यमं पर्वतोत्तमम्। ऋत्विग्भ्यक्षतुरः शैलानिमान्मंत्रानुदीरयेत् ॥२० २॥ सौभाग्यामृतसारोयं परमः शर्कराचलः। तस्मादानंदकारीत्वं भव शैलेंद्र सर्वदा ॥२०३॥ अमृतं पिबतां ये तु पतिता भुवि शीकराः। देवानां तत्समुत्थस्त्वं पाहि नः शर्कराचल ॥२०४॥ मनोभवधनुर्मध्यादुद्धता शर्करा पुनः । तन्मयोसि महाशैल पाहि संसारसागरात् ॥२०५॥ यो दद्याच्छर्कराशैलमनेन विधिना नरः । सर्वपापविनिर्मुक्तः प्रयाति ब्रह्ममंदिरम्॥२०६॥ चंद्रसूर्यप्रतीकाशमधिरुह्यानुजीविभिः । सहैव यानमुत्तिष्ठेत्ततो विष्णुप्रभो दिवि ॥२०७॥ ततः कल्पशतांते तु सप्तद्वीपाधिपो भवेत् । आयुरारोग्यसंपन्नो यावज्जन्मायुतत्रयम् ॥२०८॥ भोजनं शक्तितः कुर्यात्सर्वशैलेष्वमत्सरः । स्वयं चाक्षारलवणमश्चीयात्तदनुज्ञया ॥२०९॥ पर्वतोपस्करान् सर्वान् प्रापयेद्वाह्मणालयम्। एतत्ते सर्वमाख्यातं शैलदानमनुत्तमम् ॥२१०॥ यदन्यद्रोचते तुभ्यं तन्मां पृच्छस्व पार्थिव । भीष्म उवाच भगवनभवसंसारसागरोत्तरकारकम् ॥२११॥ किंचिद्व्रत॑ समाचक्ष्व स्वर्गारोग्यफलप्रदम् । पुलस्त्य उवाच सौरधर्म प्रवक्ष्यामि नाम्ना कल्याणसप्तमीम् ॥२९२॥ होना चाहिए ॥१९९॥ गन्धमादन पर्वत पर कुबेर को उत्तराभिमुख होना चाहिए । विपुलाचल पर वेदमूर्ति हंस को पूर्वाभिमुख होना चाहिए ॥२००॥ सुपार्श्व पर्वत पर सुवर्ण निर्मित दक्षिणाभिमुखी कामधेनु को होना चाहिये । इसमें भी धान्य पर्वत के ही समान आवाहन तथा यज्ञ इत्यादि करना चाहिए ॥२०१॥ इस तरह से करके बीच के पर्वत को आचार्य को दान दे देना चाहिए । शेष चारो विष्कम्भक पर्वतों का दान ऋत्विजों को दे देना चाहिए ।।२०२॥ दान देने के समय इन मन्त्रों का उच्चारण करना चाहिए । यह शर्कराचल सौभाग्य रूपी अमृत का सर्वश्रेष्ठ सार है । अतएव हे शैलेन्द्र तुम आनन्द प्रदान करने वाले बनो ॥२०३॥ देवताओं के अमृत पान करते समय जो बुंदें पृथिवी पर गिर पड़ी थीं उन्हीं से तुम उत्पन्न हुए हो, अतएव हे शर्कराचल तुम हमलोगों की रक्षा करो ॥२०४॥ उसके पश्चात् कामदेव के धनुष के मध्यभाग से शर्करा की उत्पत्ति हुयी । महाशैल तुम शर्करामय हो; तुम इस संसार सागर से हमारी रक्षा करो ॥२०५॥ जो मनुष्य इस विधि से शर्कराचल का दान करता है वह सभी पापों से रहित होकर ब्रह्माजी के लोक में जाता है ॥२०६॥ सैकड़ों चन्द्रमा एवं सूर्य के समान तेज: सम्पन्न वह अपने अनुचरों के साथ विमान पर चढकर वह भगवान् विष्णु के लोक में जाता है ॥२०७॥ वहाँ पर सौ कल्पों तक निवास करने के पश्चात् वह सातो द्वीपों का स्वामी होता है । वह तीस हजार जन्मों तक आयु तथा आरोग्य से सम्पन्न होता है ।।२०८॥ त्रती सभी पर्वतों पर मत्सर रहित होकर अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराता है और उनकी आज्ञा प्राप्त करके वह नमक रहित भोजन करता है ॥२०९॥ फिर पर्वतों की सारी सामग्री को ब्राह्मण के घर पहुँचवा देना चाहिए । इसतरह से मैंने सभी पर्वतों के दान की विधि तुम्हें बतलाया ॥२१०॥ हे राजन् ! आपको जो अच्छा लगे, उसे आप मुझसे पूछिये । भीष्मजी नेकहा-- हे भगवन् ! कोई ऐसा व्रत बतलाइये जो संसार सागर

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