Srishti Khanda Extracted Page 337
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-337
Sanskrit Original
अथ पापहरं वक्ष्ये सुवर्णाचलमुत्तमम्। यस्य प्रदानाद्धवनं वैरिंचं यांति मानवा: ॥१४४॥ उत्तमः पलसाहस्त्रो मध्यमः पंचभिः शतैः । तदर्धेनाधमस्तद्वदल्पवित्तोपि मानवः ॥१४५॥ दद्यादेकपलादू् यथाशक्ति विमत्सरः । धान्यपर्वतवत्सर्व विदध्याद्राजसत्तम ॥१४६॥ विष्कंभशैलांस्तद्वच्च ऋत्विग्भ्यः प्रतिपादयेत् । नमस्ते सर्वबीजाय ब्रह्मगर्भाय वै नमः ॥९४७॥ यस्मादनंतफलदस्तस्मात्पाहि शिलोच्चय । यस्मादग्रेरपत्यं त्वं यस्मात्पुत्रो जगत्पतेः ॥१४८॥ हेमपर्वतरूपेण तस्मात्पाहि नगोत्तम। अनेन विधिना यस्तु दद्यात्कनकपर्वतम् ॥१४९॥ स याति परमं ब्रह्मलोकमानंदकारकम्। तत्र कल्पशतं तिष्ठेत्ततो याति परा गतिम् ॥१५०॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि तिलशैलं विधानतः । यत्प्रदानान्नरो याति विष्णुलोकमनुत्तमम् ॥१५१९॥ उत्तमो दशभिद्रोणै मध्यमः पंचभिः स्मृतः । त्रिभिः कनिष्ठो राजेंद्र तिलशैलः प्रकीर्तितः ॥१५२॥ पूर्ववच्चापरं सर्व विष्कंभपर्वतादिकम् । दानमंत्रं प्रवक्ष्यामि यथा च तनृपपुंगव॥१५३॥ यस्मान्मधुवधे विष्णो देहस्वेदसमुद्धवाः । तिलाः कुशाश्च माषाश्च तस्माच्छांतिप्रदो भव॥१५४॥ हव्यकव्येषु यस्माच्च तिला एव हि रक्षणम् । लक्ष्मीं च कुरु शैलेंद्र तिलाचल नमोस्तु ते ॥१५५॥ इत्यामंत्र्य च यो दद्यात्तिलाचलमनुत्तमम् । स॒ वैष्णवं पदं याति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥१५६॥ कार्पासपर्वतश्चैव विंशद्धरैरिहोत्तमः । दशभि मध्यमः प्रोक्तः कनिष्ठः पंचभिर्मतः ॥९५७॥ लोक में जाता है ॥१४२॥ इसके बाद सौ कल्पों के बीत जाने पर वह सप्त द्वीपाधिपति होता है और वह आयु तथा आरोग्य से सम्पन्न होता है, तथा कोई भी शत्रु उसे परास्त नहीं कर पाता है ॥१४३॥ अब मैं पापों के विनाशक सुवर्णाचल का वर्णन करता हूँ । उसको प्रदान करने वाला ब्रह्माजी के लोक में जाता है ॥१४४॥ एक हजार पल का सुवर्णाचल उत्तम कोटि का होता है । मध्यम कोटि का वह पाँच सौ पलों का होता है । उसके आधे ढाई सौ पल का सुवर्णाचल अधम कोटि का होता है । इस तरह अल्प वित्त वाला मनुष्य ॥१४५॥ भी एक पल से अधिक भार का ही सुवर्णाचल बनवाकर दान करे । धान्य पर्वत के ही समान सभी कार्यो को करना चाहिए ॥१४६॥ उसी तरह विष्कम्भ पर्वतों को ऋत्विजों को ही देना चाहिए । दान देते समय इस मन्त्र को पढना चाहिए । सबों के बीज स्वरूप तथा ब्रह्म गर्भ आपको नमस्कार है ॥१४७॥ हे शिलोच्चय ! (पर्वत) आप अनन्त फल देने वाले हैं । आप अग्नि की सन्तान हें और जगत्पति के पुत्र हैं ॥१४८॥ हे नगोत्तम (पर्वतश्रेष्ठ) आप सुवर्णाचल रूप से मेरी रक्षा करें । इस विधि से जो सुवर्ण पर्वत का दान करता है ॥१४९॥ वह आनन्दप्रद परब्रह्म के लोक में चला जाता है । वहाँ पर सौ कल्पों तक रहकर मुक्त हो जाता है ॥१५०॥ अब मैं आपको तिल पर्वत का विधान बतलाता हुँ उसका दान करने वाला व्यक्ति सर्वोत्तम विष्णुलोक में जाता है ॥१५१॥ दश द्रोणों का तिल पर्वत उत्तम होता है । पाँच द्रोणों का मध्यम कोटि का होता है । हे राजेन्द्र ! तीन द्रोण का तिल पर्वत अधम कोटि का होता है ॥१५२॥ इसमें भी पहले के ही समान विष्कम्भ पर्वत आदि का दान करना चाहिए । हे राजश्रेष्ठ ! अब मैं तिल पर्वत के दान के मन्त्रों को बतलाता हूँ ॥१५३॥ चूकि भगवान् विष्णु के मधु नामक दैत्य का वध करते समय उनके शरीर से निकले हुए स्वेद से तिल, कुश तथा माष (उड़द) उत्पन्न हुए अतएव तुम मुझे शान्ति प्रदान करो ।।१५४।। हव्य एवं कव्य की रक्षा चूँकि तिल से ही की जाती है, हे तिलाचल ! आप मेरी लक्ष्मी को बढायें आप को नमस्कार हैं ॥१५५॥ इसतरह से आमन्त्रित करके जो व्यक्ति उत्तम तिल पर्वत का दान करता है, वह भगवान् विष्णु के लोक में चला जाता है । वह पुन: इस संसार में नहीं आता है ॥१५६॥ कर्पास पर्वत बीस भारों का उत्तम होता है । दश भारों का मध्यम
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