Srishti Khanda Extracted Page 331

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-331

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Sanskrit Original

तिलधेनुस्तृतीया च चतुर्थी जलनामिका। क्षीरधेनुः पंचमी च मधुधेनुस्तथा परा ॥६७॥ सप्तमी शर्कराधेनुरष्टमी दधिकल्पिता। रसधेनुश्च नवमी दशमी स्यात्स्वरूपतः ॥६८॥ कुंभास्स्यू रसधेनूनामितरासां स्वराशयः । सुवर्णधेनुं चाप्यत्र केचिदिच्छंति मानवाः॥६९॥ नवनीतेन तैलैश्च तथान्येपि महर्षयः । एतदेव विधानं स्यात्तएवोपस्करास्स्मृताः ॥७०॥ मंत्रावाहनसंयुक्त: सदा पर्वणि पर्वणि । यथा श्राद्धं प्रदातव्या भुक्तिमुक्तिफलप्रदाः ॥७१॥ गुडधेनुप्रसंगेन सर्वास्तव मयोदिताः । अशेषयज्ञफलदाः सर्वपापहराः शुभाः ॥७२॥ ब्रतानामुत्तमं यस्माद्विशोकद्वादशीब्रतम्। तदंगत्वेन चैवात्र गुडधेनः प्रशस्यते ॥७३॥ अयने विषुवे पुण्ये व्यतीपाते तथा पुनः । गुडधेन्वादयो देया उपरागादिपर्वसु ॥७४॥ विशोकद्वादशी चैषा सर्वपापहरा शुभा । यामुपोष्य नरो याति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥७५॥ इह लोके ससौभाग्यमायुरारोग्यमेव च । वैष्णवं पुरमाप्रोति मरणे स्मरणं हरेः ॥७६॥ नवार्बुदसहस्त्राण दशचाष्टौ च धर्मवित्। न शोकदुः खदौर्गत्यं तस्य संजायते नृप॥७७॥ नारी वा कुरुते या तु विशोकद्दादशीमिमाम् । नृत्यगीतपरा नित्यं सापि तत्फलमाप्तुयात् ॥७८॥ यस्मादग्रे हरे नृत्यमनन्तं गीतवादनम् इति पठति यइत्थं यः शृणोतीह सम्यक् मधुमुरनरकारेरर्चनं वाथ पश्येत् ॥७९॥ मतिमपि च जनानां यो ददातीन्द्रलोके स वसति विबुधौधैः पूज्यते कल्पमेकम् । धेनु है ॥६६॥ तीसरी धेनु का नाम तिल धेनु है चौथी धेनु जल धेनु है । पाझवीं धेनु दुग्ध धेनु है और छठी धेनु मधु (शहद) धेनु है ॥६७॥ सातवीं धेनु शर्करा (चीनी) धेनु और आठवीं धेनु दधि धेनु हैं । नवीं धेनु रस धेनु है और दशवी धेनु गौ धेनु हैं ॥६८॥ रस धेनु के तो घड़े होते हैं, उससे भिन्न जितनी धेनु हैं (दही, दूध, घी इत्यादि की धेनु) उनकी राशि में ही धेनु की कल्पना की जाती है । कुछ लोग इस विषय में सुवर्ण धेनु को भी बतलाते हैं।६९॥ महर्षियों ने नवनीत तथा तेल की भी धेनुओं को बतलाया हे । ये ही धेनुओं का विधान और उनकी सामग्रियाँ हैं ॥७०॥ उनका दान भिन्न-भिन्न पर्वा पर उनके मन्त्र तथा आवाहन पूर्वक करना चाहिए । श्रद्धा पूर्वक दान करने पर ये भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाली होती हैं ॥७१॥ उन सारी बातों को मैंने गुड धेनु के ही प्रसङ्ग में आपकों बतला दिया है । ये सभी धेनुयाँ सम्पूर्ण यज्ञां के फलों को देने वाली तथा सभी पापों को विनष्ट करने वाली एवं मङ्गलमयी हें ॥७२॥ विशोका द्वादशी सभी ब्रतों में उत्तम त्रत है, और उसका अङ्गभूत होने के कारण गुड धेनु सबं में श्रेष्ठ हें ॥७३॥ गुड धेनु आदि का दान, उत्तरायण आदि अयनों, संक्रान्तियों, व्यतीपात योग के होने पर तथा ग्रहण आदि के अवसर पर करना चाहिए ॥|७४॥ यह विशोक द्वादशी सभी पापों को विनष्ट करने वाली तथा मङ्गलमयी हैं । उसका उपवास करके मनुष्य भगवान् विष्णु के परम पद में चला जाता है ॥७५॥ इस लोक में आयु, आरोग्य तथा सौभाग्य को प्राप्त करके विशोक द्वादशी करने वाला मनुष्य मृत्यु के समय ही श्रीहरि का स्मरण करते हुए श्रीभगवान् के लोक में जाता है ॥७६॥ हे राजन् ! उस धर्मज्ञ पुरुष को नव अरब हजार वर्षो तक शोक, दुःख तथा दुर्गति नहीं होती है ॥७७।। यदि सदा नृत्य गीत करने वाली कोई नारी भी इस विशोक द्वादशी के ब्रत को करती है, तो वह भी उसी फल को प्राप्त करती है, जो फल पुरुष को प्राप्त होता है ॥७८॥ चूकि श्रीहरि के समक्ष अनन्त नृत्य, गीत तथा वाद्य होता है । इस तरह से जो इस प्रसङ्ग को पढता है या इस प्रसङ्ग को सुनता है अथवा मधु, मुर, नरक आदि राक्षसों के शत्रु श्रीभगवान् की अर्चना का दर्शन करता है ॥७९॥ अथवा जो व्यक्ति लोगों को

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