Srishti Khanda Extracted Page 319

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-319

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Sanskrit Original

नक्तं चरेदब्दमेकमब्दान्ते गोप्रदो भवेत् । गौरीलोके वसेत्कल्पं ततो राजा भवेदिह ॥९१॥ एतद्रुद्रवत॑ नाम सदा कल्याणकारकम् । वर्जयेच्चतुरोमासान्यस्तु गन्धानुलेपनम् ॥९ २॥ शुक्तिगन्धाक्षतान्दद्याद्विप्राय सितवाससी । वारुणं पदमाप्नोति दृढव्रतमिदं स्मृतम् ॥९३॥ वैशाखे पुष्पलवणं वर्जयेदथ गोप्रदः। भूत्वा विष्णुपदे कल्पं स्थित्वा राजा भवेदिह॥९४॥ एतच्छान्तिव्रतं नाम कीर्तिकामफलप्रदम् । ब्रह्माण्डं काञ्जनं कृत्वा तिलराशिसमन्वितम् ॥९५॥ घृतेनान्यप्रदो भूत्वा वह्निं संतर्प्यसदिद्वजम् । संपूज्य विप्रदांपत्यं माल्यवस्त्रविभूषणैः ॥९६॥ शक्तितस्त्रिपलादूर्ध्वं विश्वात्मा प्रीयतामिति । पुण्येऽह्नि दद्यादपरं ब्रह्मयात्यपुनर्भवम् ॥९७॥ एतद्दह्मब्रतं नाम निर्वाणफलदं नृणाम् । यश्चोभयमुखींदद्यात्प्रभूतसकलान्विताम् ॥९८॥ दिनं पयोव्रतं तिष्ठेत्सयाति परमं पदम्। एतट्वैसुब्रतं नाम पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥९९॥ त्र्यहं पयोव्रतः स्थित्वा काञ्जनं कल्पपोदपम्। पलाद्ूर्ध्वं यथाशक्ति तण्डुलप्रस्थसंयुतम् ॥१००॥ दत्त्वा ब्रह्मपदं याति भीमत्रतमिदं स्मृतम् । मासोपवासी योदद्याद्धेनुविप्राय शोभनाम्॥१०९॥ सवैष्णवपदं याति भीमव्रतमिदं स्मृतम्। दद्याद्विंशत्पलादूर्ध्वं महीं कृत्वा तु काञ्चनीम् ॥१०२॥ दिनं पयोब्रतस्तिष्ठेद्रुद्रलोके महीयते । धनप्रदमिदं प्रोक्तं सप्तकल्पशतानुगम् ॥१०३॥ है।।८ ९॥ और रुद्रलोक में जाता है, इसको रुद्रव्रत कहते हैं । जो व्यक्ति कार्तिक मास की तृतीया से लेकर प्रत्येक तृतीय को उपवास करके शाम को गोमूत्र मिश्रित यव की लप्सी खाता है और एक वर्ष बीत जाने पर व्रत के अन्त में गोदान करता है, वह एक कल्प तक गौरीलोक में निवास करता है, उसके बाद इस संसार में आकर राजा होता है ॥९ ०-९ १॥ इसे रुद्र व्रत कहते हैं सदा कल्याण करने वाला यह ब्रत है । जो व्यक्ति चार मासों तक गन्ध के अनुलेपन का परित्याग करता है ॥९२॥ अन्त में सीपी, चन्दन तथा अक्षत एवं दो उजले वस्त्र ब्राह्मण को देता है वह वरुण लोक में जाता है । इसे दृढव्रत कहा गया है ॥९३॥ वैशाख के महीने में पुष्प एवं नामक का परित्याग कर देना चाहिए और त्रत के अन्त में गोदान करे तो ऐसा करने वाला पुरुष कल्प पर्यन्त भगवान् विष्णु के लोक में निवास करता है और उसके बाद राजा होता है ॥९४॥ इस ब्रत को शान्ति ब्रत कहते हैं । यह यश एव कामना की पूर्ति रूपी फल को प्रदान करता है । सुवर्ण का ब्रह्माण्ड बनाकर उसे तिल के भीतर डाल दे ॥९५॥ तथा उसे घी के साथ दान करे, अग्नि में होम करे । उसके बाद ब्राह्मण भोजन कराये । ब्राह्मणदम्पती की पूजा माला, वस्त्र तथा भूषण से करे ॥९६॥ और अपनी शक्ति के अनुसार तीन पल से अधिक सुवर्ण विश्वात्मा की प्रसन्नता के लिए शुभ दिन को दान करे तो वह पखह्य को प्राप्त करता है और पुन: वह संसार में नहीं आता है ॥९७॥ इसे ब्रह्मत्रत कहते हैं और यह ब्रती को मुक्ति रूपी फल प्रदान करता है । जो पुरुष प्रभूत मात्रा में सम्पूर्ण उभयमुखी गौ का दान करता है ॥९८॥ तथा दिन में दूध पीकर रहता है वह भी परमपद को प्राप्त करता है । इसे सुव्रत कहते है । इसको करने वाले को भी इस संसार में नही आना पड़ता है ॥९९॥ जो पुरुष तीन दिन तक दूध पीकर रहता हे और एक फल से अधिक सुवर्ण का कल्पवृक्ष बनाकर उसे एक सेर चावल के साथ ब्राह्मण को दान देता है ।।१००॥ वह ब्रह्मलोक में जाता है । इस व्रत को भीमत्रत कहते है । एक महीने तक उपवास करके ब्रत के अन्त में ब्राह्मण को जो सुन्दर गौ का दान करता है ॥१०१॥ वह भगवान् विष्णु के लोक में जाता है । इस व्रत को भीमत्रत कहा गया है । बीस पल से अधिक सुवर्णमयी पृथिवी का निर्माण कराकर जो उसे ब्राह्मण को दान देता है ॥१०२। और दिन में केवल दूध पीकर रहता है, ऐसा ब्रती रुद्रलोक में जाता है यह सात कल्पों तक धन प्रदान करने वाला ब्रत है ॥१०३॥ माघ

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