Srishti Khanda Extracted Page 306

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-306

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Sanskrit Original

न रथेन सुखं याति न हयेन न दंतिना। यथात्मना विनीतेन सुखं याति महापथे ॥३००॥ न तु कुर्याद्धरिः स्पृष्टः सर्पो वा प्यतिरोषित: । अरिर्वानित्यसंक्रुद्धो यथात्मा दमवर्जितः ॥३०९॥ न यमं यममित्याहुरात्मा वै यम उच्यते । आत्मा वै यामितो येन सयमस्तु विशिष्यते ॥३०२॥ यमो यम इति प्रोक्तो वृथा तूद्विजते जनः । आत्मा वै यमितो येन यमस्तस्य करोति किम्॥३ ० ३॥ क्रव्यादेभ्यश्च भूतेभ्योऽ दान्तेभ्यश्च सदा भयम् । तेषां विप्रतिषेधार्थं दंडः सृष्टः स्वयंभुवा ॥३०४॥ दंडो रक्षति भूतानि दंड: पालयते प्रजाः। निवारयति पापिष्ठान्दंडो दुर्जय एव वा ॥३०५॥ श्यामो युवा लोहिताक्षः सर्वभूतभयावहः । दंडः शास्ता मनुष्याणां यस्मिन्धर्मः प्रतिष्ठितः॥ ३ ० ६॥ अथाश्रमेषु सर्वेषु दम एवोत्तमव्रतम् । तानि लिंगानि वक्ष्यामि यैदन्ति इति कीर्त्यते॥ ३ ०७॥ अकार्पण्यमपारुष्यं संतोषः सुविधानता। अनसूया गुरोः पूजा दया भूतेष्वपैशुनम् ॥३०८॥ षड्भिरेष दमः प्रोक्तं ऋषिभिः शांतबुद्धिभिः । दयाधीनौ धर्ममोक्षौ तथा स्वर्गश्च पार्थिव ॥३०९॥ अपमाने न कुप्येत संमाने न प्रहष्यति। समदुःखसुखो धीरः स शांत इति कीर्त्यते ॥३१०॥ शेते सुखं हि शांतस्तु सुखं हि प्रतिबुध्यते। श्रेयस्तरमतस्तिष्ठेदवमन्ता विनश्यति ॥३९९॥ पालन करने वाले तथा इन्द्रियों के प्रीणन से विरक्त रहने वाले, जिसका मन सदा अध्यात्मयोग में लगा रहता है तथा अहिंसा व्रत का पालन करने वाले को मोक्ष प्राप्त होता है ।।२९८॥ दान्त (अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाला पुरुष) सुख पूर्वक सोता है तथ सुख पूर्वक वही व्यक्ति जगता है जिसका मन सदा सभी जीवों के विषय में समदर्शी बनकर जागरुक रहता है ॥२९९॥ जीव अपनी विनीत आत्मा के द्वारा मोक्ष के मार्ग पर जिस तरह सुखपूर्वक प्रवृत्त होता है, उस तरह वह रथ, घोड़ा अथवा हाथी के द्वारा नहीं जाता है ॥३००।। अवशीकृत इन्द्रियाँ जितना अपकार करती हं, उतना अपकार सिंह, अत्यन्त क्रुद्ध सर्प, अथवा शत्रु नहीं कर पाते हैं ॥३०१॥ यम को यम नहीं कहा गया है अपितु आत्मा को ही यम कहा जाता है, जिसने अपने आत्मा (मन) को अपने वश में कर लिया है वही सर्वश्रेष्ठ यम है ॥३०२॥ यम का नाम सुनकर मनुष्य व्यर्थ ही उद्विग्न होता है । जिसने अपनी आत्मा (मन) को वश में कर लिया है, यम उसका क्या विगाड़ सकता है ?॥३०३॥ मांस भक्षी जीवों तथा अदान्त (जिसकी इन्द्रियाँ उसके वश में नहीं हैं ऐसे मनुष्यों) से सर्वदा भय बना रहता है । उन सबों को ही भगाने के लिए ब्रह्माजी ने दण्डे का निर्माण किया है ॥३०४॥ दण्ड जीवों की रक्षा करता है, दण्ड ही प्रजाओं का पालन करता है; अत्यन्त पापियों के* सन्रिकट में आने से रोकने का काम दण्डा ही करता है । अतएव दण्ड को जीतना कठिन है ॥३०५॥ श्याम, युवा तथा लाल-लाल आखों वाला दण्डधारी पुरुष ही मनुष्यों का प्रशासन करता है, दण्ड के ही बल पर धर्म टिका रहता है ॥३०६॥ सभी आश्रमों के लिए दम ही सर्वोत्तम व्रत है में उन चिह्लों को बतला रहा हूँ जिन सबों को देखकरकिसी को भी दान्त कहा जाता है ॥३०७॥ शान्त बुद्धि वाले ऋषियों ने कहा है कि कृपणता नहीं करना (उदारता), कोमलता, संतोष, किसी काम को अच्छी तरह से सम्पादन करना, अनसूया (किसी से द्वेष नहीं करना) गुरुजनों का समादर करना तथा किसी की चुगली नहीं करना इन छहों गुणों से दम की पूर्ति होती है हे राजन् ! धर्म और मोक्ष तथा स्वर्ग की प्राप्ति दया के अधीन हैं ॥३०८-३०९॥ जो अपमान होने पर क्रोध नहीं करता है तथा सम्मान पाकर प्रहृष्ट भी नहीं होता है, सुख तथा दुःख दोनों में एक समान रहने वाला तथा धैर्य सम्पन्न व्यक्ति ही शान्त कहलाता है ॥३१०॥ शान्त पुरुष सुख पूर्वक सोता है; तथा वह सुख पूर्वक जगता है । वह अधिक कल्याण को प्राप्त करता है जो उसका अपमान करने वाला होता है, उसका विनाश हो जाता है ॥३११॥ अपमानित होने वाले व्यक्ति को

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