Srishti Khanda Extracted Page 299
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-299
Sanskrit Original
न तत्र नास्तिका यांति नस्तेना नाजितेंद्रिया: । न नृशंसा न पिशुना न कृतघ्ना न मानिनः ॥२९४॥ सत्य तेजस्विनः शूरा दयावंतः क्षमापराः। यज्वानो यज्ञशीलाश्च निरीहा निरुपद्रवाः ॥२१५॥ निर्ममा निरहंकारास्तत्र गच्छति पुष्करे। न रोगो न जरा मृत्यु भवितात्र महात्मनाम् ॥२१६॥ न तत्र मूढा विशंति पुरुषा विषयात्मकाः । कामलोभमदद्रोह क्रो धमोहैरुपद्रुताः ॥२ ९७॥ तुल्यमानापमानाश्च निईद्वास्संयतेंद्रियाः। ध्यानयोगपराश्चैव ते तुगच्छंति पुष्करम् ॥२१८॥ आश्रमेषु यथोक्तेषु यथोक्तं वै द्विजातयः । ये वर्तते यमं त्रातुं तेषां लोका महोदयाः ॥२१९॥ येन हि संति भूतानि कर्मणा मनसा गिरा। अनृशंसतराः संतः सर्वदा च प्रियंवदाः ॥२२०॥ आग्निहोत्ररता नित्यं ननेत्यं चातिथिपूजकाः । नित्यं स्वाध्यायवंतश्च नित्यं स्नानपरायणाः ॥२२१॥ मातृवत्स्वसृवच्चैव तथा दुहितृवच्च ह। परदारान्प्रपश्यंति सततं विगतस्पृहाः॥२२२॥ येधिक्षिप्ता न कुप्यंति नहि संति च हिंसिताः । समदुःखसुखाः सन्तो महात्मानो जितेंद्रिया: ॥२२३॥ ते हि सर्वे प्रपश्यंति पुरा चेरु महीमिमाम्। समाधिना चिंतयंतो ब्रह्मलोकं सनातनम्॥२२४॥ अथाभवदनावृष्टिः कदाचिन्महती तदा । कृच्छुप्रायो ह्याभूत्तत्र सर्वलोकः क्षुधार्दितः ॥२२५॥ ततो निरन्ने लोकेस्मिश्चात्मानं ते परीप्सवः। मृतं कुमारमादाय कृच्छ्प्रायास्तदापचन् ॥२२६॥ ` अथपर्यचरत्तत्र क्लिश्यमानान् हि तानृषीन् । दृष्ट्वा राजा विषादार्त्तः प्रोवाचेदं वचस्तदा॥२२७॥ (सप्तर्षि आश्रम में) नास्तिक, चोर, तथा अजितेन्द्रिय नहीं जातें हैं । नृशंस (निष्ठुर स्वभाव वाले) पिशुन (चुगलखोर) कृतघ्न (किए हुए उपकार को नहीं मानने वाले) तथा मानी (अभिमानी) पुरुष वहाँ नहीं जाते हैं ॥२१४॥ उस पुष्कर तीर्थ में, सत्य बोलने वाले, तेजस्वी, शूर, वीर दयालु, क्षमाशील, यज्ञ करने वाले, यज्ञशील, अनासक्त, किसी प्रकार का उपद्रव नहीं करने वाले ॥२१५॥ ममता रहित, तथा अहङ्कार रहित मनुष्य ही जाते हैं । वहाँ पर महात्माओं को न तो कोई रोग होता है न मृत्यु होती है ॥२१६॥ वहाँ पर विषयी अज्ञानी जीव जाकर नहीं रह पाते हें और न तो काम, लोभ, मद, द्रोह, क्रोध एवं मोह करने वाले रह पाते हैं ॥२१७॥। मान तथा अपमान को एक समान मानने वाले, अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाले तथा ध्यान तथा योगपरायण व्यक्ति पुष्कर क्षेत्र में जाते हैं॥ २१८॥ उपर्युक्त आश्रमों में उपुर्यक्त प्रकार के ही लोग निवास करते हैं । जो यमराज से रक्षा करने वाले हैं, उनको उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है ॥२१९॥ जो किसी भी प्राणी को मन, कर्म तथा वाणी से कष्ट नहीं देते हैं, नैष्ठूर्य रहित वे महापुरुष सदा प्रिय बोलने वाले होते हैं ॥२२०॥ जो नित्य ही अग्निहोत्र करते हैं तथा नित्य ही अतिथियों की पूजा करते हैं, नित्य ही वेद का पाठ करते हैं तथा नित्य स्नान करते हैं ॥२२१॥ वह सदा किसी भी प्रकार की स्पृहा से रहित होकर माता, बहन अथवा पुत्री के समान दूसरों की ख्त्रियों को देखने वाले होते हैं॥२२२॥ जो निन्दा करने पर भी कुछ नहीं बोलते हैं तथा प्रहार करने पर भी प्रहार नहीं करते हैं, सुख तथा दु:ख दोनों को एक समान मानने वाले तथा जितेन्द्रिय महामात्मा गण ॥२२३॥ एकबार इस पृथिवी पर तीर्थ करने की दृष्टि से विचरण कर रहे थे । वे लोग अपनी समाधि से सनातन ब्रह्मलोक का ध्यान करने वाले थे !।२२४।। उसी समय बहुत बड़ी अनावृष्टि हुयी (सुखा पड़ा) । सभी लोग भूख तथा प्यास से व्याकुल, होकर पीडित थे ॥२२५॥ वे अन्न रहित इस संसार में अपने प्राणों की रक्षा करना चाहते थे । अत्यन्त भूखे लोग अपने भूखे बच्चों के मर जाने पर उसी को पका कर खा लेते थे ॥२२६॥ उस समय दुःखी हुए ऋषियों की सेवा करने के लिए वहाँ का राजा आया । ऋषियों को देखकर राजा विषाद के कारण आर्त हो गया और कहा ॥२२७॥। राजा ने कहा- ब्राह्मणों के
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