Srishti Khanda Extracted Page 298

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-298

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Sanskrit Original

यस्त्वेक भोजयेद्विप्रं कोटिर्भवति भोजिता । अक्षयं त्वन्नपानं च अत्र दत्तं मुनीश्वर ॥१९९॥ यो यमिच्छति कामं तु सर्व तस्य भविष्यति । न वियोनिं ब्रजत्यत्र स्नातमात्रो नरो भुवि ॥२००॥ स्थानानां परमं स्थानं तीर्थानां तीर्थमुतमम्। मया दत्तं मुनिश्रेष्ठ भविष्यति न संशयः ॥२०९॥ जन्मप्रभृतियत्पापं स्त्रिया वा पुरुषस्य वा । अत्रैव स्नातमात्रस्य सर्वमेतत्प्रणश्यति ॥२०२॥ एवमुक्त्वा तु भगवान्ब्रह्मा लोकपितामहः । जगामामंत्र्य समुनिमगस्त्यं मुनिसत्तमम्॥२०३॥ अगस्त्योपि स्थितस्तत्र आश्रमे स्वे परंतप । अगस्त्यस्याश्रमोत्पत्तिरेषा ते परिकीर्तिता ॥२०४॥ सप्तर्षीणामाश्रमांश्च कीर्त्तयिष्ये कुरूद्वह । अत्रिश्चैव वसिष्ठोथ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ॥२०५॥ अंगिरा गौतमञ्चैव सुमतिः सुमुखस्तथा । विश्वामित्रः स्थूलशिराः संवर्तश्च प्रतर्दनः ॥२०६॥ रैभ्यो बृहस्पतिश्चैव च्यवनः कश्यपो भृगुः । दुर्वासा जमदग्निश्च मार्कण्डेयोथ गालवः ॥२०७॥ उशनाथ भरद्वाजो यवक्रीतस्तथा मुनिः । स्थूलाक्षः सकलाक्षश्च कण्वो मेधातिथिः कृतः॥२०८॥ नारदः पर्वतश्चैव स्वगंधी च्यवनो द्विजः । तृणाम्बुः शबलो धौम्यः शतानंदो कृतव्रणः ॥२०९॥ जमदभ्रिस्तथा रामो ह्ाष्टकश्चैवमादयः । कृष्णद्वैपायनश्चैव पुत्रशिष्यैः समन्वितः ॥२९०॥ एते तु पुष्करं प्राप्य सप्तर्षीणामथाश्रमे । वेष्टिता नियमैश्चापि दयायुक्तास्तपस्विनः ॥२११॥ आतृशंस्यं जयो धैर्य तपः सत्यं क्षमार्जवम्। दया दानं जपश्चैव सर्वेषां तत्प्रतिष्ठितम् ॥२१२॥ इह यत्क्रियते कर्म तत्परत्रोपभुज्यते। ज्ञात्वा तदित्थं मुनयः परमार्थपरायणाः॥२१३॥ पुष्कर के लिए निकली उसका दर्शन करेगा ॥१९७॥ वहाँ पर स्नान करके देवताओं की अर्चना करेगा उसको निश्चित रूप से अश्वमेध याग करने का फल प्राप्त होगा ॥१९८॥ जो व्यक्ति वहाँ पर एक भी ब्राह्मण को भोजन करा योगा, उसको करोड़ ब्राह्मणों को भोजन कराने का फल प्राप्त होगा । हे मुनीश्वर ! यहाँ पर दिया गया अन्न तथा जल का दान अक्षय होगा ।।१९९॥ जो यहाँ पर जिस वस्तु की कामना करता है, उसकी सारी कामनाओं की पूर्ति होगी यहाँ पर केवल स्नान कर लेने वाला भी व्यक्ति निन्दित योनि में नहीं जाता है ॥२००॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! ब्रह्माजी ने उस आश्रम को सभी स्थानों से बढकर स्थान तथा सभी आश्रमों से श्रेष्ठ आश्रम होने का वरदान् प्रदान किया है; अतएव नि:सन्देह रूप से यह वैसा ही होगा ॥२०१॥ चाहे स्त्री हो या पुरुष यहाँ पर केवल स्नान कर लेने से उसके जन्म भर के सारे पाप विनष्ट हो जायेंगे ॥२०२॥ इसतरह से लोकपितामह ब्रह्माजी मुनियों में श्रेष्ठ अगस्त्य महर्षि से विदा लेकर चले गये ॥२०३॥ हे परंतप भीष्म ! अगस्त्य महर्षि भी अपने आश्रम में चले गये । इसतरह मैंने आपको अगस्त्य महर्षि के आश्रम की उत्पत्ति का वर्णन सुनाया ॥२०४॥ हे कुरुश्रेष्ठ भीष्म ! अब मैं आपको सप्तर्षि आश्रम का भी वर्णन सुनाऊंगा । अत्रि, वसिष्ठ, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु ॥२०५॥ अङ्गिरा, गौतम, सुमति, सुमुख, विश्वामित्र, स्थूल शिरा, संवर्त, प्रतर्दन ।।२०६॥ रैम्य, बृहस्पति, च्यवन, कश्यप, भृगु, दुर्वासा, जमदग्नि, मार्कण्डेय गालव॥२०७॥ उशना, भरद्वाज, यवक्रीत, स्थूलाक्ष, सकलाक्ष, कण्व, मेधातिथि ॥२०८॥ नारद, पर्वत, स्रग्गन्धी, ब्राह्मण च्यवन, तुणाम्बु, शबल धौम्य, शतानन्द, अकृतब्रण, ॥२०९॥ जमदग्नि, परशुराम तथा अष्टका आदि कृष्णद अपने पुत्र तथा शिष्यों से युक्त महर्षि कृष्णद्वैपायन ॥२१०॥ पुष्कर तीर्थ में आकर इन महर्षियों के आश्रम में “नियमों का पालन करने वाले, दयालु तपस्वि निवास कर चुके हैं ॥२११॥ इसीलिए उनमें आनृशंस्य, जय, धैर्य, तपस्या, सत्य, क्षमा,ऋजुता, दया, दान, जप ये सभी गुण प्रतिष्ठित हें ॥२१२॥ यहाँ पर जो कर्म किया जाता है, उसका फल परलोक में प्राप्त होता है । इस बात को जान करके ऋषि परमार्थ परायण हो गये ॥२१३॥ वहाँ पर

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