Srishti Khanda Extracted Page 296
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-296
Sanskrit Original
त्वत््रसादात्समुत्सेधमुपगच्छेत्समं जगत् ॥१७०॥ संपूज्यमानस्त्रिदषै महात्मा गंधर्वमुख्येषु नदत्सु चैव । दिव्यैश्च पुष्पैरवकीर्यमाणो महार्णवं निःसलिलं चकार ॥१७९॥ दष्ट्वा कृतं निःसलिलं महार्णवं सुराः समस्ताः परमप्रहृष्टाः । प्रगृह्य दिव्यानि वरायुधानि तान्दानवान् जघ्नुरदीनसत्त्वाः ॥१७२॥ ते वध्यमानास्त्रिदशै र्महात्मभि र्महाबलै वेंगयुतै र्नदद्धिः । न सेहिरे वेगवतां महात्मनां वेगं तदा धारयितुं दिवौकसाम् ॥१७३॥ ते वध्यमाना स्त्रिदशै दनिवा भीमनिःस्वनाः। चक्रुः सुतुमुलं युद्धं मुहूर्तमिव भारत ॥१७४॥ ते पूर्व तपसा दग्धा मुनिभिर्भावितात्मभिः । यतमानाः परं शक्त्या त्रिदशै र्विनिषूदिताः ॥१७५॥ ते हेमनिष्काभरणाः कुंडलांगदधारिणः । निहता वह्ृशोभंत पुष्पिता इव किंशुकाः ॥१७६॥ हतशिष्टास्ततः केचित्कालेयदनुजोत्तमाः । विदार्य वसुधां देवीं पतालतलमाश्रिताः ॥१७७॥ निहतान्दानवान्दृष्ट्वा त्रिदशा मुनिपुंगवम् । तुष्टुवु रविंविधै र्वाक्यैरिंदं चैवाब्रुवन्वचः ॥१७८॥ त्वत्रसादान्महाभाग लोकैः प्राप्तं महत्सुखम् । त्वत्तेजसा च निहताः कालेया भीमविक्रमाः ॥१७९॥ पूरयस्व महाविप्र समुद्रं लोकभावनम्। यत्त्वया सलिलं पीतं तदस्मिन्पुनरुत्सृज ॥१८०॥ एवमुक्तः प्रत्युवाच भगवान्मुनिपुंगवः । जीर्णं तद्धि मया तोयमुपायोन्यः प्रचित्यताम् ॥९८९॥ पूरणार्थं समुद्रस्य भवद्धिर्यत्नममास्थितैः । एवं श्रुत्वा तु वचनं महर्षे भावितात्मनः ॥१८ २॥ विस्मिताश्च विषण्णाश्च बभूवुः सहितास्सुराः। परस्परमनुञ्ञाप्य प्रणम्यमुनिपुंगवम् ॥१ ८ ३॥ सम्पूर्ण जगत् पुष्टि को प्राप्त करे ॥१७०॥ देवता जब महर्षि की पूजा कर रहे थे उस समय मुख्य-मुख्य गन्धर्व गण गर्जना कर रहे थे । देवता उन पर दिव्य पुष्पों की वर्षा कर रहे थे और महर्षि ने समुद्र को जल से रहित बना दिया।१७१॥ महासागर को जल से रहित देखकर देवगण अत्यन्त आनन्दित हो गये और वे दिव्य आयुधों को धारण करके उन समस्त दानवों को मार डाले ॥१७२॥ महाबलवान् तथा वेग सम्पन्न गर्जना करने वाले देवताओं के द्वार मारे जाते हुए कालेय दानव, वेग सम्पन्न उन देवताओं के वेग को नहीं वर्दास्त कर पाये ॥१७३॥ भयङ्करध्वनि करने वाले दीन बने हुए वे दानव देवताओं द्वारा मारे जाते हुए मुहूर्त पर्यन्त देवताओं के साथ भयंकर युद्ध किए।।१७४।। संसार का कल्याण करने वाले मुनियों की तपस्या से पहले ही जला दिये गये वे सारी शक्ति लगाकर युद्ध करके भी देवताओं के द्वारा मार दिये गये ॥१७५॥ सुवर्ण के आभूषणों अंगद तथा कुण्डल धारण किए हुए तथा मरे हुए दानव विकसित पलाश वृक्ष के समान सुशोभित होते थे ॥१७६॥ मरने से जो कुछ कालेय दानव बच गये थे वे पृथिवी को फाड़कर पाताल में प्रवेश कर गये ॥१७७॥ मारे गये दानवों को देखकर प्रसन्न हुए देवताओं ने महर्षि अगस्त्य की अनेक प्रकार से स्तुति की और कहा ॥१७८॥ हे महाभाग ! आपकी कृपा से ही भयङ्कर पराक्रमी दानव मारे गये और संसार के जीवों को अत्यधिक सुख की प्राप्ति हुयी ॥१७९॥ हे महाभाग ! आप पुनः इस समुद्र को भर दें, आपने जो जल पी लिया है, उसे पुन: इस महासागर में डाल दें ॥१८०॥ इसतरह से देवताओं के कहने पर महर्षि ने कहा, मैने उस जल को पचा लिया है, अब इसे भरने के प्रयास में लगे हुए आपलोगों को कोई दूसरा उपाय करना होगा । भावितात्मा महर्षि अगस्त्य की वाणी को सुनकर ॥१८१-१८२॥ सभी देवता आश्चर्य चकित तथा उदास हो गये । उन लोगों ने परस्पर में एक दूसरे से वार्ता की और मुनिश्रेष्ठ
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