Srishti Khanda Extracted Page 286
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-286
Sanskrit Original
नवियोनि ब्रजंत्येते स्नात्वा तीर्थे महात्मनः । कार्तिक्यां च विशेषेण योभिगच्छेत्तुपुष्करम् .॥३९॥ फलं तत्राक्षयं तस्य भवतीत्यनुशुश्रुम । सायं प्रातः स्मरेद्यस्तु पुष्कराणि कृतांजलिः ॥४०॥ उपस्पृष्टं भवेत्तेन सर्वतीर्थे तु कौरव। जन्मप्रभृति यत्पापं स्त्रियो वा पुरुषस्य वा ॥४१॥ पुष्करे स्नानमात्रेण सर्वमेत्प्रणश्यति। यथासुराणां प्रवरः ' सर्वेषां तु पितामहः ॥४२॥ तथैव पुष्करं तीर्थ तीर्थानामादिरुच्यते । तद्दृष्ट्वा दशवर्षाणि पुष्करे नियतः शुचिः ॥४३॥ क्रतून्सर्वानवाप्रोति ब्रह्मलोकं स गच्छति। यस्तु वर्षशतं पूर्णमग्निहोत्रमुपासते ॥४४॥ कार्तिकीं वा वसेदेकां पुष्करे सममेव तु । पुष्करे दुष्करो होमः पुष्करे दुष्करं तप: ॥४५॥ पुष्करे दुष्करं दानं वासश्चेव सुदुष्करः। ब्राह्मणो वेदविद्वांस्तु गत्वा वै ज्येष्ठपुष्करम् ॥४६॥ स्नानाद्धवेन्मोक्षभागी श्राद्धेन पितृतारकः। नाममात्रोऽपि यो विप्रो गत्वा संध्यामुपासते ॥४७॥ वर्षाणि द्वादशैवेह तेन संध्याह्मुपासिता । भवेतु नात्र संदेहः पुरा प्रोक्तं स्वयंभुवा ॥४८॥ सावित्री कथितो दोषः कुले तस्य न जायते। य॒ पत्नी ददते भर्तुः संध्योपास्तिकरिष्यतः॥४९॥ करकेण तु ताम्रेण तोयं मुक्तादिवं व्रजेत् । ब्रह्मलोकमनुप्राप्य तिष्ठति ब्रह्मणो दिनम् ॥५०॥ एकाकिना गतेनापि संध्या वंद्या यथाक्रमम्। पौष्करेणाथ तोयेन भ्षृंगारे निहितेनतु ॥५१॥ तेनापि द्वादशाब्दानि संध्योपास्ता न संशयः। भवेत्समीपगा पत्नी कुर्वतः पितृतर्पणम् ॥५२॥ है । इस पुष्कर तीर्थ में आने वाले हीन वर्ण के भी मनुष्य ।।३८॥ ब्रह्माजी के इन तीर्थो में स्नान करके पुन: हीन योनियों में नहीं जातें है । विशेषरूप से कार्तिक मास की पूर्णिमा को जो लोग पुष्कर क्षेत्र में जाते हैं ॥३९॥ उन लोगों को अक्षय फल की प्राप्ति होती है, यह सुना जाता है । जो व्यक्ति हाथ जोड़कर सायंकाल तथा प्रात:काल तीनों पुष्करों का स्मरण करता है हे कौरव ! उस व्यक्ति को सभी तीर्थो में आचमन करने का फल प्राप्त हो जाता है । जन्म से लेकर स्नान करने के समय तक स्त्री अथवा पुरुषों के जो पाप होते हैं, वे पुष्कर तीर्थ में स्नान करने मात्र से विनष्ट हो जाते हैं । जिस तरह ब्रह्माजी सभी देवताओं में आदि देव हैं ॥४०-४२॥ उसी तरह पुष्कर भी सभी तीर्थो में आदि तीर्थ है । उस तीर्थ में जाकर दश वर्षों तक जो नियम पूर्वक पावित्र्य पालन करते हुए रहता है ॥४३॥ उसको सभी याज्ञों को करने का फल प्राप्त हो जाता है, और मृत्यु के पश्चात् वह ब्रह्मलोक में जाता है । जो व्यक्ति पूरे सौ वर्षों तक रहकर अग्निहोत्र करता है ॥४४॥ उसके सदृश ही फल कार्तिक पूर्णिमा को पुष्कर में एक रात निवास करने का होता है । पुष्कर में रहकर होम करना अथवा पुष्कर में रहकर तपस्या करना कठिन है ॥४५॥ पुष्कर में दान देना तथा निवास करना भी कठिन है । वेद का विद्वान् ब्राह्मण यदि ज्येष्ठ पुष्कर में जाकर ॥४६॥ स्नान करे तो वह मोक्ष का भागी हो जाता है । यदि वह वहाँ श्राद्ध करता है, तो वह अपने पितरों का उद्धार कर देता है । यदि वह वहाँ पर नाम मात्र का सन्ध्योपासन करता है तो उसको इस लोक में बारह वर्षो तक सन्ध्योपासन करने का फल प्राप्त होता है । इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है, इस बात को ब्रह्माजी ने कहा है ॥४७॥ जो व्यक्ति सन्ध्योपासन करने वाले ब्राह्मण को पत्नी दान देता है, उसके वंश में सावित्री देवी द्वारा दिए गये शापजन्य दोष नहीं होते हैं।४८-४९॥ ताम्बे के पात्र से दिया गया जल स्वर्ग लोक तक चला जाता है । वह ब्रह्मलोक में जाकर ब्रह्माजी के दिन पर्यन्त बना रहता है ॥५०॥ यदि अकेले भी (पत्नी के साथ लिए बिना भी) पुष्कर में जाय तो वह पुष्कर में जाकर सविधि संध्यावन्दन करे । उसे सन्ध्या वन्दन के लिए झारी में पुष्कर का जल लेकर संध्या करनी चाहिए।।५१। जो अपने समीप पत्नी को बैठाकर दक्षिणाभिमुख बैठकर अपने पितरों का तर्पण करता है हे राजन् !
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