Srishti Khanda Extracted Page 282

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-282

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Sanskrit Original

स्पृशंति ये नराः केचित्तेपि ज्ञेया मुनीश्वराः । रजतस्य प्रदानेन रूपवान् जायते नरः ॥४६४॥ पुण्यापुण्यजलोपेता नदीयं ब्रह्मणः सुता। नंदानामेति विपुला प्रवृत्ता दक्षिणामुखी ॥४६५॥ गत्वा ततो नातिदूरं पुनर्याता पराङ्मुखी । ततः प्रभृति सा देवी प्रसभं प्रकटा स्थिता ॥४६६॥ तस्यास्तटेषु पुण्येषु तीर्थान्यायतनानि च । संसेवितानि मुनिभिः सिद्धैश्रापि समंततः ॥४६७॥ तेषु सर्वेषु भवति धर्महेतुस्सरस्वती । स्मानात्पानात्प्रदानाद्वा हिरण्यस्य महानदी॥४६८॥ हाटकक्षितिगौरीणां नंदातीर्थे महोदयम्। दानं दत्तं नरैः स्नातै र्जनयत्यक्षयंफलम् ॥४६९॥ धान्यप्रदानं प्रवदंति शस्तं वसुप्रदानं च तथामुनीद्राः । यैस्तेषु तीर्थेषु नरैः प्रदत्तं तद्धर्महेतुः प्रवरंप्रदिष्टम् ॥४७०॥ प्रायोपवेशं प्रयतः प्रयत्ताद्यस्तत्र कुर्यात्प्रमदा पुमान्वा । तीर्थेषु सायुज्यमवाप्य सोऽयं भुङ्क्ते फलं ब्रह्म गृहे यथेष्टम् ॥४७१॥ तस्योपकंठे तु मृतास्तु ये वै कर्मक्षयात्स्थावरजंगमाश्च । तैश्चापि सर्वे: सहसा प्रसह्य लभ्येत यज्ञस्य फलं दुरापम् ॥४७२॥ ततस्तु सा धर्मफलप्रदाभवेज्जन्मादिदुः खार्दितचेतसां नृणाम् । सर्वात्मनापुण्यफला सरस्वती सेव्या प्रयत्नात्पुरुषैर्महानदी ॥४७३॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे नंदाप्राचीमहात्म्ये अष्टादशोऽध्यायः ॥१८॥ गयी वहाँ पर तृतीया तिथि को उपवास करने से सरस्वती नदी स्त्रियों को सौभाग्य प्रदान करती है । वहाँ पर सरस्वती नदी का दर्शन करने से मनुष्य पापों से छुटकारा पा लेता है ॥४६३॥ जो लोग वहाँ पर दान करते हैं, उन्हें भी मुनीश्वर जानना चाहिए । वहाँ पर चाँदी का दान करके मनुष्य रूपवान हो जाता है ॥४६४॥ यह पवित्र तथा अवित्र जल से युक्तबादी ब्रह्माजी की पुत्री है । वहाँ से दक्षिणाभिमुख जाने वाली सरस्वती नदी नन्दा के नाम से अभिहित होती हे ॥४६५॥ वह वहाँ से थोड़ी दूर जाकर पुन: लौट गयी, उसी समय से वह सरस्वती देवी वहाँ पर स्पष्ट रूप से प्रकट रहती हैं ॥४६६॥। उसके पवित्र तटों पर पवित्र मन्दिर विद्यमान है उन सबां में मुनिजन तथा सिद्धजन निवास करते हैं ॥४६७॥ उन सभी स्थानों में सरस्वती नदी में स्नान करने, उसके जल को पीने अथवा सुवर्ण का दान करने से महानदी सरस्वती पुण्य प्रदान करती है ॥४६८।। वहाँ पर नन्दा तीर्थ में सुवर्ण, भूमि तथ गौ का दान करने से, महान् कल्याण होता है । वहाँ पर स्नान करके दिया हुआ दान अक्षय फल प्रदान करने वाला होता है॥४६९।। उन तीर्थो में मनुष्यों द्वारा किये गये अन्न दान तथा धन के दान को मुनीन्द्रं ने श्रेष्ठ बतलाया है।॥४७०॥ वहाँ पर स्त्री अथवा पुरुष को नियम तथा प्रयत्न पूर्वक निवास करना चाहिए उन तीर्थो को तो प्राप्त करके मनुष्य ब्रह्माजी के लोक में अभिलषित फलों को प्राप्त करता है ॥४७१॥ उस नन्दा तीर्थ के सन्निकट जिस मनुष्य का शरीर छुट जाता है, उसके कर्मा का नाश हो जाता है, और वह जीव सहसा यज्ञ करने का दुष्प्राप्य फल प्राप्त करता है॥४७२॥ जन्मादि दुखों से दु:खी हृदय वाले जीवों को वहाँ पर सरस्वती नाम की महानदी धर्म के फलों को प्रदान करती है । इसलिए हर प्रकार के प्रयासों के द्वारा सरस्वती नदी का सेवन करने का प्रयास करना चाहिए ॥४७३॥ इसतरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के नन्दा प्राची सरस्वती तीर्थ के माहात्म्य वर्णन नामक अठारहवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ॥१८॥ — Ne र (६)टू

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