Srishti Khanda Extracted Page 281

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-281

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Sanskrit Original

किं तेऽभिधानं कल्याणि ब्रूहि मेऽज्ञस्य सुव्रते । नंदोवाच मम नंदेतिसंज्ञा तु कृतानंदेन स्वामिना ॥४४९॥ सांप्रतं भक्षयामीति ह्यतिष्ठः केन हेतुना । नंदेति श्रुत्वा तन्नाम मुक्तशापः प्रभंजनः ॥४५०॥ पुनर्जृपत्वमापन्नो बलरूपसमन्वितः । एतस्त्निंतरे धर्मस्तां ज्ञात्वा सत्यवादिनीम् ॥४५१॥ द्रष्टुं समागतस्तत्र प्राब्रवीच्च पयस्विनीम् । तव सत्यब्रताद्धष्टो धर्मोहमिह चागतः ॥४५२॥ नंदे वृणीष्व भद्रं ते वरं वरतमं हि यत् । एवमुक्ता हि सा देवी नंदा तं प्रार्थयद्वरम्॥४५३॥ तवानुभावात्ससुता गच्छामि पदमुत्तमम् । भवेदिदं शुभं तीर्थ मुनीनां धर्मदायकम् ॥४५४॥ मन्नाम्ना च सरिदियं नंदानामसरस्वती। वरप्रदानाद्देवेश तदेतत्प्रार्थितं मसा ॥४५५॥ पुलस्त्य उवाच सा तत्क्षणाद्नता देवी स्थानं सत्यवतां शुभम् । प्रभंजनोपि तद्राज्यं संप्राप्तः प्रागुपार्जितम् ॥४५६॥ नंदा येन गतास्वर्ग नंदां प्राप्यसरस्वतीम् । तेनाख्यया बुधैस्तस्याः प्रोक्ता नंदासरस्वती ॥४५७॥ सरस्वती पुनस्तस्माइनात्खर्जूरसंज्ञितात्। दक्षिणेन पुनर्याता प्लावयंती धरातलम् ॥४५८॥ आगच्छन्नपि यस्तस्या नाम गृह्णाति मानवः । जीवन्सुखं स आप्रोति मृतो भवति खेचरः ॥४५९॥ तत्र ये शुभकर्माणस्त्यजति स्वां तनुं नराः । ते विद्याधरराजानो भवंति सुखिनो जनाः ॥४६०॥ नराणां स्वर्गानिःश्रेणी स्नानात्पानात्सरस्वती। तत्र स्नानंप्रकुर्वन्ति येऽष्टम्यां सुसमाहिताः ॥४६९॥ ते मृताः स्वर्गमासाद्य मोदंते सुमनोरमाः । सरस्वती सदास्त्रीणां तत्र सौभाग्यदायिका ॥४६२॥ उपोषिता तृतीयायामपि सौभाग्ग्रभाजना । तत्र तद्दर्शनेनापि मुच्यत पापसंचयात् ॥४६३॥ नन्द है । उन्होंने मेरा नाम नन्दा रखा है ॥४४९॥ पहले तो तुमने कहा था कि मैं तुम्हे खा जाऊंगा किन्तु तुमने ऐसा क्यों नहीं किया ? नन्दा इस नाम को सुनते ही राजा प्रभंजन शाप मुक्त हो गये ॥४५०॥। वे पुन: बल तथा रूप से युक्त राजा हो गये । इसी बीच धर्मराज नन्दा को सत्यवादिनी समझकर ॥४५१।। उसको देखने के लिए आये और उस गो से कहे, तुम्हारे सत्यत्रत से प्रसन्न होकर मैं यहाँ आया हूँ । में धर्मराज हूँ ॥४५२॥ हे नन्दे ! तुम्हें जो सबसे अच्छा वर मालुम पड़े उसे तुम माँग लो । धर्मराज के इस तरह कहने पर नन्दा ने यह वरदान माँगा॥४५३॥ आपकी कृपा से मैं अपने पुत्र के साथ उत्तम गति को प्राप्त करूं । यह मुनियों को पुण्य प्रदान करने वाला शुभ तीर्थ वन जाय ॥४५४।॥ मेरे ही नाम से सरस्वती नदी के इस तीर्थ का नाम नन्दा सरस्वती हो जाय । हे देवेश ! प्रदान करने वाले आप से मेरी यही प्रार्थना है ॥४५५॥। महर्षि पुलस्त्य ने कहा-- उसी समय वह नन्दा देवी सत्यवादियों के उत्तम लोक में चली गयी । राजा प्रभज्ञन भी पहले से अर्जित अपने राज्य को प्राप्त कर लिए॥४५६॥ चूँकि नन्दा सरस्वती को प्राप्त करके नन्दा स्वर्ग चली गयी इसलिए विज्ञ पुरुषों ने उसी के नाम से उस तीर्थ को नन्दा सरस्वती कहा ॥४५७॥ उसके वाद सरस्वती उस खर्जूरी वन से पृथिवी को सींचती हुयी दक्षिण दिशा में चली । पुष्कर आते हुए जो मनुष्य उस नन्दा सरस्वती का नाम लेता है, वह अपने जीवन में सुख को प्राप्त करता है और मृत्यु के बाद वह आकाशचारी देवता होता है ॥४५९॥ वहाँ पर जो पुण्यवान् पुरुष अपने शरीर का त्याग करते हैं, वे सुखी पुरुष मृत्यु के पश्चात् विद्याधरराज होते हैं ॥४६०॥ स्नान करके उसके जल को पीने वाले के लिए सरस्वती नदी स्वर्ग का सोपान बन जाती है । जो लोग उस तीर्थ में अष्टमी तिथि को भक्ति पूर्वक स्नान करते हैं ॥४६१॥ वे मृत्यु के पश्चात् स्वर्गलोक में जाकर अत्यधिक आनन्द का अनुभव करते हैं वहाँ पर सरस्वती नदी स्त्रियों के लिए सदा सौभाग्य प्रदान करने वाली रहती है ॥४६२॥ कुछ दूर जाकर सरस्वती नदी पुनः लौट

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