Srishti Khanda Extracted Page 270

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-270

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Sanskrit Original

देवैरपि यथा सर्वर्भत्तिव्यमवशैर्धुवम्। तस्मात्तुनाहमेवैका व्याध्र शोचामि जीवितम् ॥२९७॥ कितु स्नेहेन वै साधो दुःखेन रुदितं मया। अस्ति मे हृदि संतापस्तं च त्वं श्रोतुमर्हसि ॥२९८॥ प्रथमे वयसि प्राप्ते प्रसृताऽहं मृगाधिप । इष्टः प्रथमजातश्च सुतस्तु मम बालकः ॥२३९॥ क्षीरपाची च मे वत्सस्तृणं नाद्यापि जिघ्रति। स च गोपकुले बद्ध: क्षुधार्तो मामवेक्षते ॥३०.॥ तमहं चानुशोचामि कथं जीविष्यते सुतः । तस्येच्छामि स्तनं दातुं पुत्रस्रेहवशं गता ॥३०९॥ पाययित्वा स्तनं वत्समवलिह्य च मूर्द्धनि । सखीनामर्पयित्वा तु संदिश्य च हिताहितम् ॥३ ० २॥ पुनः प्रत्यागमिष्यामि यथेष्टं भक्षयिष्यसि। स नंदाया वचः श्रुत्वा मृगेंद्रः पुनरब्रवीत् ॥३०३॥ किं ते पुत्रेण कर्त्तव्यं मरणं किं न बुध्यसे । त्रस्यांति सर्वभूतानि म्रियंते मां निरीक्ष्य च ॥३०४॥ त्वं पुनः कृपयाविष्टा पुत्रपुत्रेति भाषसे । न पुत्रा न तपो दानं न माता न पिता गुरुः॥३०५॥ शक्तुबंति परित्रातुं नरं कालप्रपीडितम् । कथं त्वं गोकुलं गत्वा गोपीजनसमाकुलम् ॥३०६॥ वृषभैर्नादितं दिव्यं बालवत्सविभूषितम् । भूषणंदेवलोक्स्य स्वर्गतुल्यं न संशयः ॥३०७॥ नित्यं प्रमुदितं दिव्यं सर्वदेवप्रपूजितम् । यत्पवित्रं पवित्राणां मंगलानां च मंगलम्॥३०८॥ यत्तीर्थं सर्वतीर्थानां धन्यानां धन्यमुत्तमम् । समस्तगुणसंफन्नमीश्वरायतनं महत् ॥३०९॥ यत्ख्यातं सर्वतीर्थानां भूमिस्वर्गमनुत्तमम् । गोपी मंथन शब्देन बालवत्सरवेण च ॥३१०॥ गवां हुंकारशब्देन अलक्ष्मी प्रतिहन्यते। यत्र वत्साश्च हुंकारं करुणं मातृकांक्षया ॥३९१॥ यद्गोपैः पालितं शूरै ् बाहुयुद्धकृतश्रमैः । प्रगीतनृत्यसंलापं नंदिता स्फोटनादितम्॥३१२॥ भी विवश होकर मरना निश्चित हैं । अतएव हे व्याघ्र में अकेले अपने जीवन के विषय में शोक नहीं करती हूँ॥२९७॥। किन्तु हे सिंह स्नेह और दुःखजन्य दुःख के कारण मैं रोयी । मेरे हृदय में जो कष्ट है, उसे आप सुने॥२९८॥ मेने अपना पहली बार वच्चा दिया है, वह पहला बच्चा मुझको अत्यन्त प्रिय है ॥२९९॥ वह अभी दूध ही पीता है । घास को तो वह सूंघता भी नहीं है । वह गोपकुल में बँधा है, भूखा है, मेरी प्रतीक्षा कर रहा हैं॥३००॥। उसी के विषय में मैं सोचती हूँ कि अब वह मेरा बच्चा कैसे जीयेगा ? में आपने पुत्र स्नेह के कारण अपना स्तन उसे पिलाना चाहती हूँ ३०१५॥ उस अपने बछड़े को दूध पिलाकर तथा उसका माथा चाटकर, उसे अपनी सखियों को समर्पित करके तथा उसको हित एवं अहित का उपदेश करके ॥३०२॥ पुन: लौट आऊँगी फिर आप अपनी इच्छानुसार मुझे खा लें । नन्दा की वाणी सुनकर सिंह ने फिर कहा ॥३०३॥ तुम्हे अपने बच्चे से क्या मतलब हे अब तो तुम मरने वाली हो । मुझको देखकर सभी जीव भयभीत हो जाते हैं और मर जाते हैं ॥३०४॥ तुम तो करुणा ग्रस्त होकर पुत्र-पुत्र चिल्ला रही हो । पुत्र, तपस्या, दान, माता, पिता अथवा गुरु ॥३०५॥ कालग्रस्त जीव को नहीं बचा सकते हैं । गोपी से भरे गोशाला में जाकर, जहाँ बैल हुंकार करते होंगे, तथा छोटे बच्चे विद्यमान होंगे इसप्रकार देवलोक को अलङ्कृत करने वाले तथा स्वर्ग के समान ॥३०७॥ सदैव प्रसन्न रहने वाले दिव्य तथा सभी देवताओं से जो पृजित है, जो सभी पवित्र वस्तुओं से पवित्र तथा मङ्गलमय वस्तुओं से अधिक मङ्गलमय हैं ॥३०८॥ जो सभी तीर्थो का तीर्थ होता है और सभी धन्य पदार्थो से अधिक धन्य होता है, जो सभी उत्तम गुणों से युक्त तथा परमात्मा का श्रेष्ठ निवास स्थान होता है ॥३०९॥ जो सभी तीर्थो के भूमितीर्थ के रूप में विख्यात होता है । जो गोपियों के दधिमंथन ध्वनि से तथा छोटे बछड़ों की हुंकार ध्वनि से गुंजित होता है ॥३१०॥ जहाँ गायों के रंभाने की ध्वनि से दारिद्रय का नाश होता है । जहाँ पर बछड़े अपनी माताओं को देखने की इच्छा से

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