Srishti Khanda Extracted Page 256

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-256

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Sanskrit Original

मुहूर्त तिष्ठतां तेषामृषिकोटिरुपागता। श्रुत्वा पैतामहं यज्ञं तेषां पूजां तु केशवः ॥९४॥ आसनानि ददौ तेषां तदा देवः पिनाकधृत्। वसिष्ठोर्घं ददौ तेषां ब्रह्मणा परिचोदितः ॥९५॥ गामर्ध च ततो दत्वा पृष्ट्वा कुशलमव्ययम् । निवेशं पुष्करे दत्वा स्थीयतामिति चाब्रवीत् ॥९६॥ ततस्त ऋषयः सर्वे जटाजिनधरास्तथा । शोभयंतः सरः श्रेष्ठं गङ्गामिव दिवौकसः ॥९७॥ मुंडाः काषायिणश्चैके दीर्घश्मश्रुधराः परे । विरलैर्दशनैः केचिच्चिपिटाक्षास्तथा परे ॥९८॥ बृहत्तनूदराः केपि केकराक्षास्तथा परे । दीर्घकर्णा विकर्णाश्च कर्णश्च त्रुटितास्तथा ॥९९॥ दीर्घफालाविफालाश्च॒ स्मायुचर्मावगुंठिताः । निर्गतं चोदरं तेषां मुनीनां भावितात्मनाम् ॥९००॥ दृष्ट्वा तु पुष्करं तीर्थ दीप्यमानं समंततः। तीर्थलोभान्नरव्याघ्र तस्य तीरे व्यवस्थिताः ॥१०१॥ वालखिल्या महात्मानो ह्यश्मकुट्टास्तथा परे । दंतोलूखलिनश्चान्ये संप्रक्षालास्तथा परे ॥१०२॥ वायुभक्षा जलाहाराः पर्णाहारास्तथा परे । नानानियमयुक्ताश्च तथा स्थंडिलशायिनः॥१०३॥ सरस्यस्मिन् मुखं दृष्ट्वा सुरूपास्याः क्षणादभुः । किमेतदितिचिंत्याथ निरीक्ष्य च परस्परम् ॥१०४॥ अस्मिस्तीर्थेदर्शनेन मुखस्येह सुरूपता । मुखदर्शनमित्येव नाम कृत्वा तु तापसाः ॥१०५॥ स्नाता नियमयुक्ताश्च सुरूपास्ते तदाभवन् । देवपुत्रोपमा जाता अनौपम्यगुणान्विताः ॥१०६॥ वाणी को सुनकर ब्रह्माजी सन्तुष्ट हो गये ॥९३।। उन सबों के मुहूर्त भर ठहरने पर करोड़ो ऋषिगण वहाँ आ गये । वे ब्रह्माजी के यज्ञ के विषय में सुनकर आये थे । उनलोगों की भगवान् विष्णु ने पूजा की उन लोगों को भगवान् शङ्कर ने आसन प्रदान किया । ब्रह्माजी की आज्ञा प्राप्त करके वसिष्ठ महर्षि ने उन ऋषियों को अर्ध प्रदान किया॥९४-९५॥ गो तथा अश्च प्रदान करके उन ऋषियों से महर्षि वसिष्ठ ने कुशल पूछा । इसके बाद उन लोगों को पुष्कर में निवास प्रदान करके उन्होंने कहा कि आपलोग यहीं निवास करें ॥९६॥ उसके बाद वे सभी जटा तथा मृगचर्म धारण करने वाले ऋषि उस श्रेष्ठ सरोवर को उसी तरह से सुशोभित किए जिस तरह से गङ्गा नदी को देवगण सुशोभित करते हैं ॥९७॥ कुछ ऋषि मुण्ड मुड़ाये हुए तथा गेरुआ वस्त्र धारण किए थे, दूसरे ऋषियों की दाढी लम्बी थी । कुछ लोगो के दाँत विरल (दूर-दूर) थे तो कुछ लोगों के नेत्र चिपटे थे ॥९ ८॥ कुछ ऋषि विशाल शरीर तथ पेट वाले थे, तो कुछ ऋषि केकराक्ष (टेढे देखने वाले) थे । कुछ लोगों के कान लम्बे थे, कुछ के कान नहीं थे, कुछ के कान टुटे हुए थे ॥९९॥ कुछ लम्बे फाल वाले थे तथा कुछ फाल रहित थे । वे स्नायु तथा चर्म से बँधे थे । उन भक्ति सम्पन्न मुनियों के पेट बढे हुए थे ॥१००॥ उनलोगों ने चारो ओर से देदीप्यमान पुष्कर तीर्थ को देखा, हे नरश्रेष्ठ भीष्मजी ! तीर्थ के लोभ से वे ऋषि उसी सरोवर के तट पर ही व्यवस्थित हो गये ।।१० १॥ उनमें कुछ बालखिल्य महात्मा थे तथा कुछ महात्मा पत्थर से ही कूटकर अन्न खाने वाले (अश्मकूट्ट) थे । कुछ दाँत रूपी ओखली वाले थे । अर्थात् दाँत से ही कूँचकर खाने वाले थे तथा कुछ संप्रक्षाल (अच्छी तरह से धोकर) अन्न ग्रहण करने वाले थे ।।१०२॥ कुछ ऋषि वायु पीकर रहने वाले, कुछ जल पीकर ही रहने वाले, कुछ पत्तों का ही आहार करने वाले थे । अनेक प्रकार के नियमों का पालन करने वाले तथा स्थण्डिल पर सोने वाले थे ॥ १ ०३॥ वे जब इस सरोवर में अपना मुख देखे तो देखते ही क्षणभर में ही सुन्दर मुख वाले हो गये । यह क्या हो गया ? इसतरह से सोचकर वे एक-दूसरे को देखने लगे ॥१०४॥ इस तीर्थ में देखने के ही कारण हमलोगों का मुख सुन्दर हो गया है, यह सोचकर तपस्वियों ने उस तीर्थ का नाम मुखदर्शन तीर्थ रख दिया ॥१०५॥ वे नियम पूर्वक स्नान करने पर सुन्दर रूप वाले हो गये । अनुपम गुणों से युक्त वे देवपुत्र के समान लगने लग गये ॥१०६॥ हे नरश्रेष्ठ ! वे सभी

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