Srishti Khanda Extracted Page 250
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-250
Sanskrit Original
गायत्री चापि रुद्रेण स्तुता च वरवर्णिनी । तं श्रुत्वा प्रतिमात्मानं विस्तरेण पितामहम्॥३॥ प्रहष्टानि च रोमाणि प्रशांतं च मनो मम। श्रुत्वा म॒ परमा प्रीतिः कौतूहलमथैव हि ॥४॥ नारायणस्तु भगवान् कृत्वा तां परमां च वै । ब्रह्मपत्या: स्तुतिं भक्तया न्यस्य तां पर्वतोपरि ॥५॥ उवाच वचनं विष्णुस्तुष्टिपुष्टिप्रदायकम्। श्रीमति ह्वीमती चैव या च देवीश्वरी तथा॥६॥ एतदेवं श्रुतं ब्रह्मंस्तव वक्त्राद्विनिः सृतम् ।उत्तरं तत्र यद्भूतं यच्चतस्मिन्स्थले कृतम् ॥७॥ आनुपूर्व्या च तत्सर्वं भगवान्वक्तुमर्हति । श्रुतेन मे देहशुद्धिर्भविष्यति न संशयः ॥८॥ पुलस्त्य उवाच यजतः पुष्करे तस्य देवस्य परमेष्ठिनः । शृणु राजन्निदं चित्रं पूर्वमेव यथाकृतम्॥९॥ आदौ कृतयुगे तस्मिन्यजमाने पितामहे । मरीचिरंगिराश्चैव पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ॥९०॥ दक्षः प्रजापतिश्चैव नमस्कारं प्रचक्रिरे । विद्योतमानाः पुरुषाः सर्वाभरणभूषिताः ॥९९॥ उपनृत्यंति देवेशं विष्णुमप्सरसां गणाः । ततो गंधर्वतूर्यैस्तु प्रतिनंद्य विहायसि॥१२॥ बहुभिः सह गंधर्वैः प्रगायति च तुंबरुः । महाश्रुतिश्चित्रसेन ऊर्णायुरनघस्तथा ॥९३॥ गोमायुस्सूर्यवर्चाश्च सोमवर्चाश्च कौरव। युगपच्च तृणायुश्च नंदिश्चित्रर थस्तथा ॥ १ ४॥ त्रयोदशः शालिशिराः पर्जन्यश्च चतुर्दशः । कलिः पंचदशश्चात्र तारकश्चात्र षोडशः ॥९५॥ हाहाहूहूश्च गंधर्वो हंसश्चैव महाद्युतिः। इत्येते देवगंधर्वा उपगायांति ते विभुम् ॥१६॥ तथैवाप्सरसो दिव्या उपतृत्यंति तं विभुम्। धातार्यमा च सविता वरुणोंशो भगस्तथा॥९७॥ इंद्रो विवस्वान्पूषा च त्वष्टा पर्जन्य एव च । इत्येते द्वादशादित्या ज्वलंतो दीप्ततेजसः ॥१८॥ ने सावित्री देवी का सभी स्थानों में वर्णन किया है, उसे मैंने सुना है ॥२॥ रुद्र ने वरवर्णिनी गायत्री देवी की जो स्तुति की, उसके अतिरिक्त ब्रह्माजी की प्रतिमा का वर्णन मैंने विस्तार से सुना ॥३॥ इसे सुनकर मेरा मन प्रसन्न एवं शान्त हो गया है । उसे सुनकर मुझे परम शान्ति मिली है और मेरे मन में कौतूहल उत्पन्न हो गया है ॥४। भगवान् नारायण ने ब्रह्माजी की पत्नी सावित्री देवी की अत्यन्त श्रेष्ठ स्तुति कर उनकी पर्वत के ऊपर स्थापना की ॥५॥ भगवन् विष्णु ने उनको तुष्टि एवं पुष्टि प्रदान करने वाली वाणी सुनाया, उनको श्रीमती, हीमती, देवी तथा ईश्वरी कहा ॥६॥ हे ब्रह्मन् ! मैंने आपके मुख से इतना ही सुना है । उसके बाद वहाँ जो अद्भुत कार्य हुआ ॥७॥ हे भगवान् ! उन सारी बातों को आप मुझे क्रमशः सुनायें । उसे सुनकर मेरे शरीर की शुद्धि हो जायेगी ॥८॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- पुष्कर क्षेत्र मे ब्रह्माजी द्वारा यज्ञ किए जाने के समय जो आश्चर्य की बात हुयी उसे आप सुनें ॥९॥ प्रथम सत्ययुग में ब्रह्माजी यज्ञ कर रहे थे । उस समय मरीचि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु ॥१०॥ तथा दक्ष प्रजापति आकर ब्रह्माजी को नमस्कार किए । सभी अलङ्कारों से अलङ्कृत पुरुष देदीप्यमान थे ॥११॥ देवताओं में श्रेष्ठ भगवान् विष्णु के समक्ष अप्सराओं का समूह नृत्य कर रहा था । उस समय गन्धर्वगण वाद्यो के द्वारा आकाश में उनका अभिनंदन करके अनेक गन्धर्वो के साथ तुम्बरु गायन कर रहे थे । महाश्रुति, चित्रसेन, ऊर्णायु, अनघ, गोमायु, सूर्यवर्चा, सोमवर्चा, युगपत्, तृणायु, नन्दि, चित्ररथ ॥१२-१४॥ तेरहवें शालिशिरा, चौदहवें पर्जन्य, न्द्रहवें कलि, सोलहवें तारक, हाहा, हुहू, तथा महाद्युति हंस, ये सभी देव गन्धर्व ब्रह्माजी की स्तुति कर रहे थे।१५-१६॥ ब्रह्माजी के सन्निकट दिव्य अप्सरायें नृत्य कर रही थीं धाता, अर्यमा, वरुण, अंशु, भग, इन्द्र, विवस्वान्, पृषा, त्वष्टा तथा पर्जन्य ये बारहो अपने तेज से देदीप्यमान होने वाले आदित्य ॥१७-१८॥ सभी श्रेष्ठ
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