Srishti Khanda Extracted Page 242
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-242
Sanskrit Original
सर्वयज्ञतपोदानतीर्थवेदेषु यत्फलम् । तत्फलं कोटिगुणितं लभेतैतप्रतिष्ठया ॥२२५॥ पौर्णमास्युपवासं तु कृत्वा भक्तया नराधिप । अनेन विधिना यस्तु विरिंचि पूजयेन्नरः ॥२२६॥ प्रतिपदि महाबाहो स याति ब्रह्मणः पदम् । विरिचि वासुदेवं तु ऋत्विग्भिश्च विशेषतः ॥२२७॥ कार्तिके मासि देवस्य रथयात्रा प्रकीर्तिता । यां कृत्वा मानवा भक्त्या सं यांति ब्रह्मलोकताम्॥२२८॥ कार्तिके मासि राजेंद्र पौर्णमास्यां चतुर्मुखम् । मार्गेण ब्रह्मणा सार्द्ध सावित्र्या च परंतप ॥२२९॥ भ्रामयेन्नारं सर्व॑ नानावाद्यसमन्वितः। स्त्रापयेद् भ्रामयित्वा तु सलोका नगरं नृप ॥२३०॥ ब्राह्मणान्भोजयित्वाग्रे शांडिलेयं प्रपूज्य च । आरोपयेद्र्थे देवं पुण्यवादित्रनिःस्वनैः ॥२३९॥ रथाग्रे शांडिली पुत्रं पूजयित्वा विधानतः । ब्राह्मणान्वाचयित्वा तु कृत्वा पुण्याहमङ्गलम् ॥२३२॥ देवमारोपयित्वा च रथे कुर्यात््रजागरं। नानाविधैः प्रेक्षणिकै ् रह्मधौषैश्च पुष्कलैः ॥२३३॥ कृत्वा प्रजागरं देवं प्रभाते ब्राह्मणाज्गप। भोजयित्वा यथाशक्ति भक्ष्यभोज्यैरनेकशः ॥२३४॥ पूजयित्वा जनं धीरमंत्रेण विधिवन्नप। आज्येन तु महाबाहो पयसा पायसेन च ॥२३५॥ ब्राह्मणान्वाचयित्वा तु स्वस्त्या तु विधिवन्नप | कृत्वा पुण्याहशब्दं च तद्रथं भ्रामयेत्पुरे॥२३६॥ विप्रैश्नतुर्वेदविद्धि भ्रामयेद्ृह्मणो रथम् । वहवृचाथर्वणैर्वीर छंदोगाध्वर्युभिस्तथा ॥२३७॥ भ्रामयेद्देवदेवस्य सुरश्रेष्ठस्य तं रथम्। प्रदक्षिणं पुरं सर्वं मार्गेण सुसमेन तु॥२३८॥ नवोढव्यो रथो वीर शूद्रेणहितमिच्छता। नचारोहेद्रथं प्राज्ञो मुक्त्वैकं भोजकृन्त्रपः॥२३९॥ ब्रह्मणो दक्षिणे पारश्चे गायत्रीं स्थापयेन्नप । भोजकं वामपार्श्वे तु पुरतः पंङ्कजं न्यसेत्॥२४०॥ पुण्य की प्राप्ति होती है, उसे आप लोग सावधानी पूर्वक सुनें ॥२२४॥ समस्त यज्ञां तपस्याओं, दानों एवं तीर्थों के करने से जिस फल की प्राप्ति होती हैं उसक करोड़ गुणा फल की प्राप्ति उनकी प्रतिष्ठा करने से होती है ॥२२५॥ हे नराधिप ! पूर्णिमा के दिन उपवास करके प्रतिपत् तिथि को जो मनुष्य इस विधि से ब्रह्माजी की पूजा करके मरता हे॥२२६॥ वह ब्रह्माजी के लोक में जाता है । ऋत्विजों के द्वारा ब्रह्माजी के साथ भगवान् वासुदेव की पूजा करने से विशेष रूप से फल की प्राप्ति होती है ॥२२७॥ कार्तिक के महीने में ब्रह्माजी की रथयात्रा बतलायी गयी है । उस रथ यात्रा को भक्तिपूर्वक करने वाले मनुष्य ब्रह्माजी के लोक में जाते हैं ॥२२८॥ हे परंतप ! कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन चतुर्मुख ब्रह्माजी को सावित्री देवी के साथ श्रमण कराने वाले मनुष्य ॥२२९॥ को चाहिए कि वह अनेक प्रकार के वाद्यों के साथ ब्रह्माजी को सम्पूर्ण नगर में भ्रमण कराये । भ्रमण कराकर उनको नगर के लोगों के साथ स्नान कराये ॥२३०॥ पहले ब्राह्मणों को भोजन कराकर, फिर शाण्डिलेय की पूजा करे । उसके बाद पवित्र वाद्यों की ध्वनि करते हुए ब्रह्माजी को रथ पर स्थापित करे । रथ के आगे शाण्डिली पुत्र का विधिपूर्वक पूजन करके, फिर ब्राह्मणों के द्वारा पुण्याहवाचन कराये ॥२३१-२३२॥ ब्रह्माजी को रथ पर स्थापित करके अनेक प्रकार के प्रदर्शनों तथा वेद घोषों से जागरण करे ॥२३३॥ हे राजन् ! रात्रि में प्रजागरण करके प्रात:काल अपनी शक्ति के अनुसार अनेक प्रकार के भक्ष्य भोज्य सामग्रियों से ब्राह्मणों को भोजन कराकर, धीर मंत्रों के द्वारा उनकी विधिपूर्वक पूजा करे । घृत, दुग्ध, पायस के द्वारा ॥२३५॥ ब्राह्मणों से विधिपूर्वक स्वस्वाचन कराये । उसके बाद पुण्याहवाचन कराकर उस रथ कोनगर में घुमाये ॥२३६॥ चारो वेदों के ज्ञाता ब्राह्मणों के द्वारा ब्रह्माजी के रथ को धुमवाये । ऋग्वेद तथा अथर्ववेदछान्दोग्य तथा यजुर्वेद के ज्ञाताओं के द्वारा ॥२३७॥ देवराध्य, तथा श्रेष्ठ देवता ब्रह्माजी के रथ को घुमवाये। समतल मार्गो से सम्पूर्ण नगर में दक्षिणावर्त घुमाना चाहिए ॥२३८॥ हे वीर ! कल्याण चाहने वाले व्यक्ति को उस रथ
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