Srishti Khanda Extracted Page 232
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-232
Sanskrit Original
एवं प्रजल्पतां तत्र विप्राणां कोपमाविशत्। के यूयं के$5त्रप्रवरा वयं श्रेष्ठस्तथापरे ॥८ ६॥ नेति नेति तथा विप्रा हिजांस्तांस्तत्र संस्थितान् । ब्रह्मोवाचाभिसंप्रेक्ष्य ब्राह्मणान् क्रोधपूरितान् ॥८७॥ यस्माद्यं त्रिभिभगिः सभायां बाह्यतः स्थिताः । तस्मादामूलिको गुल्मो ह्येको भवतु वो द्विजाः ॥८८॥ उदासीनाः स्थिता ये तु उदासीना भवंतु ते । सायुधा बद्धनिस्त्रिंशा योद्धकामा व्यवस्थिताः ॥८९॥ कौशिकीति गणो नाम तृतीयो भवतु द्विजाः । त्रिधाबद्धमिदं स्थानं सर्वं युष्मद्भविष्यति ॥९०॥ बाह्यतो लोकशब्देन प्रोच्यमाना: प्रजास्त्विह । अविज्ञेयमिदं स्थानं विष्णुः पालयिता ध्रुवम् ॥९९॥ मया दत्तं चिरस्थायि अभंगं च भविष्यति । एवमुक्त्वा तदा ब्रह्मा समाप्तिं तामवैक्षत॥९२॥ ब्राह्मणाः सहितास्ते तु क्रोधामर्ष समन्विताः। अतिथिं भोजयानाश्च वेदाभ्यासरतास्तु ते ॥९३॥ एतच्च परमं क्षेत्रं पुष्करं ब्रह्मसंज्ञितम्। तत्रस्था ये द्विजाः शांता वसंति क्षेत्रवासिनः॥९४॥ न तेषां दुर्लभं किचिदब्रह्मलोके भविष्यति । कोकामुखे कुरुक्षेत्रे नैमिषे ऋषिसंगमे ॥९५॥ वाराणस्यां प्रभासे च तथा बदरिकाश्रमे । गंगाद्वारे प्रयागे च गंगासागरसंगमे॥९६॥ रुद्रकोट्यां विरूपाक्षे मित्रस्यापि तथावने। तीर्थेष्वेतेषु सर्वेषु सिद्धिर्याद्वादशाब्दिका ॥९७॥ प्राप्यते मानवै लोके घषण्मासाद्राजसत्तम । पुष्करे तु न संदेहो ब्रह्मचर्यमना यदि ॥९८॥ तीर्थानां परमं तीर्थं क्षेत्राणामपि चोत्तमम् । सदा तु पूजितं पूज्यै भक्तियुक्तैः पितामहे॥९९॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि सावित्र्या ब्रह्मणा सह । वादो यथानुभूतस्तु परिहासकृतो महान् ॥१००॥ से कौन सा वरदान माँगा जाय ?।।८४॥।। अग्निहोत्र, वेद तथा अनेक शास्त्र तथा जो संतानिकलोक हैं वे लोक हमलोगों को प्राप्त हो ॥८५॥ इसतरह से वे ब्राह्मण जब कह रहे थे, उस समय वहाँ पर विद्यमान कुछ ब्राह्मण क्रुद्ध हो गये और कहे-- तुम लोग कौन हो ? हम प्रवर लोग कोन हैं ? तथा दूसरे जो श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं ॥८६॥ वहाँ पर विद्यमान क्रुद्ध ब्राह्मणों को देखकर ब्रह्माजी ने कहा ऐसी बात नहीं है, ऐसी बात नहीं है ॥८७॥ चूकि आपलोग सभा में बाहर से तीन भागों में स्थित है इसलिए आपलोगों में एक भाग तो मूलतः गुल्मिक होगा ॥८८॥ जो लोग उदासीन बैठे हैं, वे उदासीन हो जायं, जो लोग आयुध के साथ कृपाण बाँधकर युद्ध करना चाहते हैं वे लोग ॥८९॥ हे द्विजो ! वे तीसरे भाग के ब्राह्मण कोशिकीगण नाम वाले हो जायँ । तीन प्रकार से बँधा हुआ यह स्थान सम्पूर्ण रूप से आपलोगों का होगा । बाहर से लोक शब्द से कही जाने वाली यहाँ की प्रजा है और यह स्थान अविज्ञेय है। इसके स्वामी भगवान् विष्णु हैं ॥९०-९१॥ इसे मैंने प्रदान किया हे, अतएव यह चिरस्थायी तथा अभङ्ग (कभी नष्ट नहीं होने वाला) होगा । इसतरह से कहकर ब्रह्माजी ने उस सभा को समाप्त कर दिया ॥९२॥ क्रोध एवं आमर्ष से समन्वित वे ब्राह्मण, अतिथियों को भोजन कराते हुए वेदाभ्यास में संलग्न हो गये ॥९३॥ ब्रह्मसंज्ञक यह पुष्कर क्षेत्र सर्वश्रेष्ठ क्षेत्र है । वहाँ पर जो क्षेत्रवासी शान्त ब्राह्मण निवास करते हैं ।॥९४॥ उन ब्राह्मणों को ब्रह्मलोक में कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं होगी । कोकामुख, कुरुक्षेत्र, ऋषियों के सङ्गमस्थान नैमिषारण्य ।॥९५॥। वाराणसी, प्रभास क्षेत्र, बदरिकाश्रम, गङ्गाद्वार (हरिद्वार) प्रयाग, गङ्गासागर, सङ्गमस्थल ॥९६॥ रुद्रकोटि तीर्थ, विरूपाक्ष तीर्थ तथा मित्रवन इन समस्त तीर्थो में बारह वर्षो में जो सिद्धि मनुष्यों को प्राप्त होती है, हे राजश्रेष्ठ ! पुष्कर क्षेत्र में वह सिद्धि छह मासों में ही ब्रह्मचर्य पालन करते हुए रहने पर प्राप्त हो जाती है इसमें किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं है ॥९७-९८॥ वह सभी तीर्थो में श्रेष्ठ तीर्थ है तथा, सभी क्षेत्रों में उत्तम क्षेत्र है, वहाँ पर पूज्य पुरुष भक्तिपूर्वक ब्रह्माजी की सर्वदा पूजा करते हैं ॥९९॥ इसके बाद मैं ब्रह्माजी तथा सावित्री में जो वंवाद हुआ, जो महान् परिहास को उत्पन्न करने वाला है,
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know