Srishti Khanda Extracted Page 225

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-225

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Sanskrit Original

.9 श्रीपद्ममहापुराण समानभावतां याति पंकजं नास्य नेत्रयोः । कोपमाजलशंखेन प्राप्ताश्रवणशंङ्ञयोः ॥१८ १॥ विद्ठुमोप्यधरस्यास्य लभते नोपमां श्रुवम्। आत्मस्थममृतं होष संस्रवं श्रेष्टते ध्रुवम् ॥१८२॥ यदिकिंचिच्छुभं कर्म जन्मांतरशतैः कृतम् । तत्रसादात्पुनर्भर्ता भवत्वेष ममेप्सितः ॥९८३॥ एवंचिंतापराधीना यावत्सा गोपकन्यका। तावद्वह्या हरिं प्राह यज्ञार्थं सत्वरं वचः ॥१८४॥ देवी चैषा महाभागा गायत्री नामतः प्रभो । एवमुक्ते तदाविष्णु ब्रह्माणं प्रोक्तवानिदम् ॥१८५॥ तदेनामुद्दहस्वाद्य मया दत्तां जगत्प्रभो । गांधर्वेणविवाहेन विकल्पं माकृथाश्चिरम् ॥१८६॥ अमुं गृहाणदेवाद्य अस्याः पाणिमनाकुलम्। गांधर्वोणविवाहेन उपयेमे पितामहः ॥१८७॥ तामवाप्य तदा ब्रह्माजगादाध्वर्युसत्तमम्। कृता पत्नी मया होषा सदने मे निवेशय ॥१८८॥ मृगश्वृंगधरा बाला क्षौमवस्त्रावगुंठिता। पत्नीशालां तदानीता ऋत्विग्भिर्वेदपारगैः ॥१८९॥ औदुंबेरण दंडेन प्रावृतो मृगचर्मणा । महाध्वरे तदा ब्रह्मा धम्नास्वेनैव शोभते ॥१९०॥ प्रारब्धं च ततो होत्रं ब्राह्मणैवेदपारगैः । भृगुणा सहितैः कर्मवेदोक्तं तैः कृतं तदा ॥१९९॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे गायत्रीसंग्रहोनाम षोडशोऽध्यायः । १६॥ ke अधिक रूपवान दिखते हैं । इन्होनें तो रत्न सर्वस्व मेरे मन का ही हरण कर लिया है ॥१७९॥ इनके मुख में जो सौन्दर्य है वह चन्द्रमा में कैसे हो सकता है । उस सकलङ्क चन्द्रमा की उपमा इनके निष्कलङ्क मुख से नहीं दी जा सकती है ॥१८०॥ इनके नेत्रों के समान कमल की शोभा नहीं हो सकती है और न तो इनके कर्ण रूपी शंख के साथ जल से उत्पन्न होने वाले शंख की कोई भी शोभा हो सकती है ?।।१८१॥ निश्चित रूप से इसके ओष्ठों की उपमा विद्रुम (मुंगे) से नहीं हो सकती है और इनकी आत्मा में विद्यमान अमृत भी निश्चित रूप से प्रवाहित होना चाहता है ॥१८२॥ यदि मैंने सैकड़ों जन्मों में कोई पुण्य किया है, तो उसके फलस्वरूप ये मेरे अभिलषित पति हों॥ १८ ३॥ जिस समय वह गोपकन्या इस तरह से सोच रही थी उस समय ब्रह्माजी ने यज्ञ के लिए शीघ्रता करते हुए श्रीहरि से कहा ॥१८४॥ हे प्रभो ! ये महाभागा गायत्री नामकी देवी हैं । इस तरह से कहने पर भगवान् विष्णु ने ब्रह्माजी से कहा ॥१८५॥ हे प्रभो ! में इसे आपको प्रदान करता हूँ आप इसके साथ विवाह करें आप इसके साथ गान्धर्व विवाह करें देर न करें ॥१८६॥ आज आप इसके सुन्दर हाथों को अनुगृहीत करें । इसके बाद ब्रह्माजी ने गायत्री के साथ गान्धर्व विवाह किया ॥१८७॥ उसको प्राप्त करके ब्रह्माजी ने श्रेष्ठ अध्वर्यु से कहा इसको मैंने अपनी पत्नी बना लिया; इसे आप मेरे भवन में प्रवेश करायें ॥१८८॥ उस समय वह बाला अपने हाथ में मृग का शृंग लेकर रेशमी वस्र धारण की हुयी वेदों में पारङ्गत ऋत्विजों के द्वारा पत्नीशाला में लायी गयी ॥१८९॥। उसके बाद अपने हाथ में गूलर के दण्ड को लेकर तथा मृगचर्म पहनकर उस महायज्ञ में अपनी कान्ति से सुशोभित हुई।। १९०॥ उसके बाद वेदपारङ्गत भृगु इत्यादि ब्राह्मणों के द्वारा कर्मकाण्डोक्त वेदोक्त मन्त्रों से अग्निहोत्र प्रारम्भ हो गया । इसतरह हजारों युग तक पुष्कर में ब्रह्माजी का यज्ञ हुआ ।।१९१॥ इस तरह पद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के गायत्री विवाह नामक सोलहवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ॥१६॥ HS

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