Srishti Khanda Extracted Page 224

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-224

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Sanskrit Original

आनीतासि विशालाक्षि मा शुचो वरवर्णिनि। गोपकन्यामसौ दृष्ट्वा गौरवर्णा महाद्युतिम् ॥१६५॥ कमलामेव तां मेने पुंडरीकनिभेक्षणाम् । तप्तकांचनसद्धित्तिसदृशा पीनवक्षसम्॥१६६॥ मत्तेभहस्तवृत्तोरु रक्तोत्तुंगमखत्विषम्। तं दृष्ट्वाऽ मन्यतात्मानं मन्मथस्येषुगोचरम् ॥९६७॥ तत्प्राप्तिहेतुकधिया गतचित्तेव लक्ष्यते। प्रभुत्वमात्मनो दाने गोपकन्याप्यमन्यत ॥९६८॥ यद्येषमां सुरूपत्वादिच्छत्यादातुमाग्रहात् । नास्ति सीमंतिनी काचिन्मत्तोधन्यतरा भुवि ॥१६९॥ अनेनाहं समानीता यच्चक्षुरगोचरं गता । अस्यत्यागे भवेन्मृत्युरत्यागेजीवितं सुखम् ॥१७०॥ भवेयमपमानाच्च धिग्रूपादुः खदायिनी । दृश्यते चक्षुषा नेन यापियोषित्प्रसादतः ॥९७१॥ सापि धन्या न संदेहः किं पुनर्या परिष्वजेत् । जगद्रूपमशेषं हि पृथक् संचारमाश्रितम् ॥९१७२॥ लावण्यं तदिहैकस्थं दर्शितं विश्वयोनिना । अस्योपमा स्मरः साध्वी मन्मथस्य त्विषोपमा॥९७३॥ तिरस्कृतस्तु शोकोयं पिता माता न कारणम् । यदि मांनैष आदत्ते स्वल्पं मयि न भाषते॥१७४॥ अस्यानुस्मरणान्मृत्युः प्रभविष्यति शोकजः । अनागसि च पत्न्यां तु क्षिप्रं यातेयमीदृशी ॥१७५॥ कुचयो र्मणिशोभायै शुद्धाम्बुजसमद्युतिः । मुखमस्य प्रपश्यंत्या मनो मे ध्यानमागतम् ॥१७६॥ अस्यांगस्पर्शसंयोगान्न चेत्त्वं बहुमन्यसे । स्पृशन्नटसि तर्हि न त्वं शरीरं वितथं परम् ॥१७७॥ अथवास्य न दोषोस्ति यदृच्छाचारको ह्यसि । मुषितः स्मर नूनं त्वं संरक्ष स्वांप्रियां रतिम्॥१७८॥ त्वत्तोपि दृश्यते येन रूपेणायं स्मराधिकः। ममानेन मनोरत्न सर्वस्वं च हतं दृढम् ॥१७९॥ शोभाया दूश्यते वक्त्रे साकुतः शशलक्ष्मणि। नोपमासकलंकस्य निःष्कलं केन शस्यते॥९८०॥ अत्यधिक कान्ति सम्पन्न गौराङ्गी गोपकन्या को देखकर ।।१६५॥ उस कमलनयनी को लक्ष्मी ही माना । सन्तप्त सुवर्ण निर्मित दिवाल के समान उसका विस्तृत वक्षःस्थल था ।।१६६॥ उसके जङ्घे मदमत्त हस्ती के सूढ जैसे गोल थे, उसके लाल-लाल नख ऊपर की ओर उठे हुए थे । वह सुन्दरी भी ब्रह्माजी को दूसरे कामदेव के समान देखी।। १६७॥ वह भी लगता था की ब्रह्माजी को प्राप्त करना चाहती है । गोप कन्या ने भी मान लिया कि मैं इनको अपने को समर्पित कर सकती हुँ ॥१६८॥ उसने सोचा यदि ये आग्रह पूर्वक मुझको प्राप्त करना चाहते हैं तो फिर मुझसे बढकर कोई दूसरी नारी सौभाग्यवती नहीं होगी ॥१६९॥ इसने जो मुझको देखकर यहाँ लाया है, यदि मैं इनको त्याग देती हूँ तो मैं जी नहीं सकती हूँ, यदि इनको मैं स्वीकार कर लेती हूँ तो मेरा जीवन सुखी हो जायेगा॥१७०॥ इनका अपमान करके तो मेरा रूप धिक्कार के योग्य होगा और में अपने को दुःख देने वाली हो जाऊंगी । ये जिसको अपने प्रेम भरे नेत्रों से देख लें वह भी नारी धन्य हो जाय और जिस नारी का ये आलिङ्गन कर लें उसके सौभाग्य के बारे में क्या कहना है ? सम्पूर्ण जगत् में रूप तो पृथक्-पृथक् स्थित है; किन्तु विश्व के खरष्टा ने इनमें तो संसार के सम्पूर्ण रूप को एकत्रित कर दिया है । इनकी सुन्दर उपमा तो कामदेवसे ही दी जा सकती है॥१७३॥ यदि में इनका त्याग कर देती हुँ तो मुझे जो शोक होगा उसके कारण मेरे माता-पिता नहीं होंगे । यदि ये मुझको नहीं अपनाते हैं, मुझसे बातें नही करते हैं ॥१७४॥।। तो इनका याद ही करके में मर जाऊंगी । निर्दोष पत्नी के होने पर यह ऐसी हो गयी ॥१७५॥ स्तनों पर मणि की शोभा उत्पन्न करने वाले शुद्ध कमल की कान्ति के समान कन्ति वाले इनके मुख को देखते ही मेरा मन ध्यान मग्न हो गया ॥१७६॥। यदि इनके अंगों के संस्पर्श को तुम बहुत महत्त्व नहीं देते हो, यदि इनको स्पर्श करके तुम नहीं भ्रमण करते हो तो तुम्हारा शरीर व्यर्थ हो गया॥ १७७॥। अथवा इसमें इनका कोई दोष नहीं है तुम तो अपनी इच्छा के अनुसार संचरण करने वाले हो हे कामदेव ! निश्चित रूप से ठगे जा चुके हो जाकर अपनी पत्नी रति की रक्षा करो ॥१७८॥ क्योंकि हे कामदेव ! ये तो तुमसे भी

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