Srishti Khanda Extracted Page 190
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-190
Sanskrit Original
मृष्टिखण्ड १६५ दीक्षां वै विस्मयं त्यक्त्वा बृहस्पतिरुदारधीः । एकमग्रिं च संस्कृत्य महात्मात्रिदिवौकसाम् ॥१०३॥ प्रादादांगिरसस्तुष्टो जाप्यं वेदोदितं तु यत् । त्रिसुपर्णं त्रिमधु च पावमानी च पावनीम् ॥१०४॥ स हि जाप्यादिकं सर्वमशिक्षयदुदारधी:। आपोहिष्ठेति यत् स्तानं ब्राह्मं तत्परिपठ्यते ॥१०५॥ पापघ्नं दुष्टशमनं पुष्टिश्रीबलवर्द्धनम् । सिद्धिदं कीर्तिदं चैव कलिकल्मषनाशनम् ॥१०६॥ तस्मात्सर्वप्रयत्मेन ब्राह्मं स्नानं समाचरेत् । कुर्वतो मौनिनो दांता दीक्षिताः क्षपितेद्रियाः ॥१०७॥ सर्वे कमंडलुयुता मुक्तकक्षाक्षमालिनः । दंडिनश्चीरवस्त्राश्च जटाभिरतिशोभिताः ॥१०८॥ स्मानाचारासनरता: प्रयत्मध्यानधारिणः । मनो ब्रह्मणि संयोज्य नियताहारकांक्षिणः॥१०९॥ अतिष्ठन् दर्शनालाप संगध्यानविवर्जिताः । एवं व्रतधराः सर्वे त्रिकालं स्नानकारिणः ॥११०॥ भक्त्या परमया युक्ता विधिना परमेण च । कालेन महताध्यानाद्देवज्ञानमनोगताः ॥९ १ १॥ ब्रह्मध्यानाग्निनिर्दग्था यदा शुद्धैकमानसाः । आविर्बभूवभगवान्सर्वेषां दृष्टिगोचरः ॥१ ९ २॥ तेजसाप्यायितास्तस्य बभूवु भ्रांतचेतस: | ततोवलंब्य तेधैर्यमिष्टं देवं यथाविधि ॥१ १३॥ षंडंगवेदयोगेन दृष्टचितास्तु तत्पराः। शिरोगतैरंजलिभिः शिरोभिश्च महीं गताः॥१९४॥ तुष्टुवुः सृष्टिकर्तारं स्थितिकर्तार मीश्वरम् । देवा ऊचुः ब्रह्मणे ब्रह्मदेहाय ब्रह्मण्यायाजिताय च ॥११५॥ उसके बाद वृहस्पतिजी ने वैदिक विधि से यज्ञ किया । ब्रह्माजी के उस यज्ञ में बृहस्पतिजी अध्वर्यु थे वे मृणाल से युक्त पद्म को पद्म दीक्षा के प्रयोग द्वारा यज्ञ को कराये ॥१०१॥ देवताओं की इच्छा से प्रेरित होकर वृहस्पतिजी ने देवताओं को अनुगृहीत किया । उन्होने वेदोक्त विधि से देवताओं को दीक्षित किया । उदार बुद्धि वाले वृहस्पति ने दीक्षा दी । महात्मा वृहस्पति ने देवताओं में विद्यमान अग्नि को संस्कार युक्त करके ॥१०३॥ संतुष्ट होकर उन्हे वेदोक्त आङ्गिरस मन्त्र का उपदेश दिया । त्रिसुपर्ण, त्रिमथु तथा पवित्र बनाने वाली पावमानी सूक्त ॥१०४॥ को सम्पूर्ण रूप से जपने योग्य की शिक्षा दी । आपो हिष्ठा इत्यादि जो व्राह्मस्नान कहा गया है, वह पापों को विनष्ट करने वाला, दुष्टों को शान्त करने वाला, पुष्टि, श्री तथा बल को बढाने वाला है । वह सिद्धि देने वाला, कीर्ति देने वाला तथा कलि के पापों को विनष्ट करने वाला है ॥१०६॥ इसलिए सभी प्रकार के प्रयासों द्वारा व्राह्मस्नान करना चाहिए । उसको करते हुए सभी देवता, मौनी, दान्त (इन्द्रियों को वश में रखने वाले) दीक्षित तथा जितेन्द्रिय हो गये॥१०७॥ सव कमण्डलु धारण किए हुए थे, कक्ष खोल दिए थे, माला धारण किए हुए थे । दण्ड धारण किए हुए थ, वल्कल वस्त्र धारण किए थे तथा जटाधारण करके सुशोभित हो रहे थे ॥१०८॥ वे स्नान, सदाचार तथा आसन के नियमों का पालन करते हुए प्रयत्न पूर्वक ध्यान करते थे । अपने मन को ब्रह्म में लगाकर अनुष्ठान के लिए विहित आहार करते थे ॥१०९॥ वे एक-दूसरे को देखना, बातें करना तथा सङ्ग का त्याग कर दिए थे । इसतरह व्रत का पालन करने वाले वे सव त्रिकाल स्नान करते थे ॥११०॥ वे विधिपूर्वक परमा भक्ति के द्वारा, बहुत समय तक ध्यान करके ब्रह्माजी के ध्यान से युक्त हो गये ॥१११॥ ब्रह्माजी का ध्यान करने के कारण उनके पाप विनष्ट हो गये और उनका मन जब शुद्ध हो गया, तव भगवान् ब्रह्माजी उन सबो को दर्शन दिए ॥११२॥ श्रान्तचित्त वाले वे सभी देवता ब्रह्माजी के तेज से आप्यायित (पुष्ट) हो गये । उसके बाद वे सब लोग धैर्य धारण करके विधि पूर्वक अपने इष्टदेव ब्रह्माजी की स्तुति किए । ब्रह्मपारायण देवताओं का मन उस समय प्रसन्न हो गया था, उन लोगों
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