Srishti Khanda Extracted Page 189

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-189

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Sanskrit Original

पद्मिनीमृगपुष्पाढ्यं सुदृढं शुशुभे तदा । प्रविश्याथ वनं देवाः सर्वपुष्पोपशोभितम् ॥८७॥ इह देवोस्तीति देवा बभ्रमुश्च दिदृक्षवः । मृगयन्तस्ततस्ते तु सर्वे देवाः सवासवाः ॥८८॥ अद्भुतस्य वनस्यांतं न ते ददृशुराशुगाः । विचिन्वद्भिस्तदादेवं दैवैर्वायुर्विलोकितः ॥८ ९॥ स तानुवाच ब्रह्माणं न द्रक्ष्यथ तपो विना । तदाखिन्नाविचिऱ्वंतस्तस्मिन्पर्वतरोधसि ॥९०॥ दक्षिणे चोत्तरे चैव अंतराले पुनः पुनः । वायूक्तं हृदये कृत्वा वायुस्तानब्रवीत्पुनः ॥९९॥ त्रिविधो दर्शनोपायो विरिंचेरस्य सर्वदा । श्रद्धाज्ञानेन तपसा योगेन च निगद्यते ॥९२॥ सकलं निष्कलं चैव देवं पश्यंति योगिनः । तपस्विनस्तु सकलं ज्ञानिनो निष्कलं परम् ॥९३॥ समुत्पन्ने तु विज्ञाने मंदश्रद्धो न पश्यति । भक्तद्या परमया क्षिप्रं ब्रह्मपश्यंति योगिनः ॥९४॥ द्रष्टव्यो निर्विकारोऽसौ प्रधानपुरुषेश्वरः । कर्मणा मनसा वाचा नित्ययुक्ताः पितामहम् ॥९५॥ तपश्चरत भद्रं वो ब्रह्माराधनतत्पराः। ब्राह्मी दीक्षां प्रपन्नानां भक्तानां च द्विजन्मनाम् ॥९६॥ सर्वकालं स जानाति दातव्यं दर्शनं मया। वायोस्तु वचनं श्रुत्वा हितमेतदवेत्य च॥९७॥ ब्रह्मच्छा विष्टयतयो वाक्पति च ततोब्रुवन् । प्रज्ञानविबुधास्माकं ब्राह्मीं दीक्षां विधत्स्व नः ॥९८॥ सदिदीक्षयिषुः क्षिप्रममरानब्रह्मदीक्षया । वेदोक्तेन विधानेन दीक्षयामास तान् गुरुः ॥९९॥ विनीतवेषाः प्रणता अंतेवासित्वमाययुः । ब्रह्मप्रसादं संप्राप्ताः पौष्करं ज्ञानमीरितम्॥९००॥ यज्ञं चकार विधिना धिषणोऽध्वर्युसत्तमः । पडांकृत्वामृणालाढ्यं पद्मदीक्षाप्रयोगतः ॥१०९॥ अनुजग्राह देवास्तान्सुरेच्छाप्रेरितो मुनिः । तेभ्यो ददौ विवेकिभ्यः सर्वदोक्तविधानवित् ॥९०२॥ देवताओं के आने से नन्दन वन के समान ॥८६॥ कमल, मृग तथा पुष्पों से भरा हुआ वह वन अत्यधिक सुशोभित हुआ । सभी प्रकार के पुष्पों से सुशोभित उस वन में प्रवेश करके देवगण ॥८७॥ यही पर ब्रह्माजी हैं, यह सोचकर उनका दर्शन करने की इच्छा से चारो ओर घूमने लगे । इन्द्र के साथ सभी देवता ब्रह्माजी को खोज रहे थे ॥८८॥ शीघ्रगामी वे देवगण उस अद्भुत वन में ब्रह्माजी को नहीं देखे । किन्तु ब्रह्माजी को खोजते हुए देवताओं ने वायुदेव को देखा ॥८९॥ वायु ने कहा कि आपलोग तपस्या के बिना ब्रह्माजी को नहीं देख पायेंगे । उसके बाद खिन्न होकर देवताओं ने पर्वत की तलहटी में ब्रह्माजी को खोजा ।।९०॥ वायु की बातों को सुनकर दक्षिण तथा उत्तर में तथा दोनों के बीच में देवताओं ने बार-बार खोजा वायु ने देवताओं से कहा ॥९१॥ ब्रह्माजी के दर्शन के तीन उपाय हैं ज्ञान, तपस्या था योग युक्त श्रद्धा ॥९२॥ योगिजन ब्रह्माजी को सकल तथा निष्कल रूप से देखते है । तपस्वीजन सकल रूप से तथा योगिजन निष्कल रूप से ॥९३॥ विज्ञान उत्पन्न हो जाने पर भी जिसकी श्रद्ध मन्द होती है, वह भी उनका दर्शन नहीं पाता है । परमाभक्ति के द्वारा योगिजन ब्रह्माजी का शीघ्र दर्शन पा लेते हैं ॥९४॥ प्रधान तथा पुरुष के नियामक ब्रह्माजी को निर्विकार रूप से देखना चाहिए । आप लोग कर्म, वाणी तथा मन से श्रद्धा सम्पन्न होकर पितामह की तपस्या करें । जो प्रपन्न भक्त तथा ब्राह्मण ब्राह्मी दीक्षा से युक्त होकर ब्रह्माजी की आराधना करते हैं, उसके विषय में ब्रह्माजी सदा यह जानते हैं कि मुझे दर्शन देना चाहिए । वायु की वाणी को सुनकर तथा यही कल्याणकारी है, इस बात को जानकर ॥९५-९७।॥ ब्रह्माजी की प्राप्ति की इच्छा से आविष्ट बुद्धि वाले वे देवता बृहस्पतिजी से कहे, हे ज्ञानप्रधान देव ! हमलोगों को आप ब्राह्मी दीक्षा प्रदान करें ॥९८॥ दीक्षा देने के इच्छुक बृहस्पति शीघ्र ही देवताओं को वेदोक्त विधि से ब्राह्मीदीक्षा से दीक्षित किए ॥९९॥ विनीतवेश वाले तथा नम्र बने हुए देवता बृहस्पतिजी के छात्र हो गये और ब्रह्माजी की कृपा से उन सबों को पुष्कर संबन्धि ज्ञान हो गया ॥१००॥

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