Srishti Khanda Extracted Page 185
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-185
Sanskrit Original
शीतलो वाति खंभूमिं दिशो यत्राभिवासयन्। हरितस्निग्धनिश्छित्रै रकीटकवनोत्कटैः ॥ २७॥ वृक्षैरनेकसंज्ञै र यद्धूषितं शिखरान्वितैः। अरोगैर्दर्शनीयैश्च सुवृत्तैः कैञ्चिदुज्ज्वलैः ॥२८॥ कुटुंबमिवविप्राणामृत्विग्भि भाति सर्वतः । शोभते धातु संकाशैरंकुरैः प्रावृता द्रुमाः॥२९॥ कुलीनैरिव निश्छिद्रैः स्वगुणैः प्रावृता नरा: । पवनाविद्धशिखरैः स्पृशंतीव परस्परम् ॥३०॥ आजिप्रंतीव चान्योन्यं पुष्पशाखावतंसकाः । नागवृक्षः क्वचित्पुष्पै ्ु मवानीरकेसरैः ॥३९॥ नयनैरिव शोभंते चंचलैः कृष्णतारकैः । पुष्पसंपन्नशिखराः कर्णिकारद्रुमाः क्वचित् ॥३२॥ युग्मयुग्मा द्विधा चेह ' गोभंन्त इव दंपती । सुपुष्पप्रभवाटोपैस्सिथुवारद्वुपंक्तय: ॥३३॥ मूर्तिमत्य इवाभांति पूजिता वनदेवताः। क्वचित्क्वचित्कुंदलताः सपुष्पाभरणोज्वलाः ॥३४॥ दिक्षु वृक्षेषु शोभन्ते बालचंद्रा इवोच्छिताः । सर्जार्जुनाः क्वचिद्धान्ति दनोद्देशेषु पुष्पिताः॥३५॥ धौतकौशेयवासोभिः प्रावृता: पुरुषा इव। अतिमुक्तकवल्लीभिः पुष्पिताभिस्तथा द्रुमाः ॥३६॥ उपगूढा विराजते स्वनारीभिरिवप्रियाः । अपरस्परसंसक्तैः सालाशोकाश्च पल्लवैः ॥३७॥ हस्तैर्हस्तान्स्पृशंतीव सुहृदश्चिरसंगताः । फलपुष्पभरा नम्राः पनसाः सरलार्जुनाः ॥३८॥ अन्योन्यमर्चयंतीव पुष्पैश्चैव फलैस्तथा । मारुतावेगसंश्लिष्टैः पादपास्सालबाहुभिः ॥३९॥ अभ्याशमागतं लोकं प्रतिभावैरिवोत्थिताः । पुष्पाणामवरोधेन सुशोभार्थं निवेशिताः ॥४०॥ वसंतमहमासाद्य पुरुषान्स्पर्द्यंति हि । पुष्यशोभाभरनतैः शिखरे र्वायुकंपितैः ॥४ ९॥ नृत्यंतीव नराः प्रीताः स्रगलंकृतशेखराः। शृंगाग्रपवनक्षिप्ताः पुष्पाबलियुताद्रुमाः ॥४२॥ आकाश भूमि तथा दिशाओं को सुगन्धित बनाती रहती थी । हरे चिकने छिद्र रहित कीट रहित, वन में उत्पन्न अनेक नामों वाले वृक्षों से सुशोभित, शिखरों से युक्त, निरोग, दर्शनीय, सुन्दर आचरण वाले देदीप्यमान ऋत्विजों से युक्त, ब्राह्मणों के कुटुम्ब के समान सुशोभित धातुओं के समान अंकुरों से घिरे हुए वृक्ष उसी तरह सुशोभित होते थे; जिसतरह कुलीन तथा दोष रहित पुरुष अपने गुणों से सुशोभित होते हैं । वायु से टकराने के कारण लगता था कि उनका (वृक्षों का) शिरोभाग एक-दूसरे को स्पर्श कर रहा हो ॥२७-३०॥ पुष्पों तथा शाखाओं से युक्त नागवृक्ष जैसे एक दूसरे का घ्राणन कर रहे हों । कहीं पर पुष्पं द्वारा वेतस वृक्ष काले-काले नेत्रों की काली पुतलियों के समान केसरों से सुशोभित होते थे । कहीं पर पुष्पं से युक्त कर्णिकार वृक्ष ॥३१-३२॥ पर दो-दो जोड़ों (दम्पतियों) के समान शोभते थे । सुन्दर पुष्पों से युक्त सिन्दुवार वृक्ष की पंक्तियाँ ॥३३॥ पूजा की गयी मूर्तिमान वन देवता के समान सुशोभित होती थीं । कहीं-कही पर पुष्प रूपी अलङ्कार से सुशोभित कुन्दलता ॥|३४॥ दिशाओं के वृक्षों में उदित होने वाले चन्द्रमा के समान शोभती थी । वन के किसी प्रदेश में सर्ज तथा अर्जुन के पुष्पित वृक्ष सुशोभित होते थे ॥३५॥ धोये गये रेशमी वस्र को धारण किए हुए पुरुष के समान वृक्ष विकसित अतिमुक्तक लताओं से अपनी प्रिय-पत्नियों से आलिङ्गित पुरुषों के समान लगते थे । परस्पर में एक-दूसरे से नहीं सटे हुए पल्लवों द्वारा शाल तथा अशोक के वृक्ष ॥३६-३७॥ फल तथा पुष्पों से भरे हुए पनस (कटहल, सरल तथा अर्जुन) के वृक्ष दीर्घ काल के बाद मिलकर परस्पर में एक-दूसरे का हाथ पकड़ने वाले मित्र के समान सुशोभित होते थे । वायु के वेग के कारण एक-दूसरे से सटे हुए वृक्ष साल रूपी अपनी भुजाओं से परस्पर में एक-दूसरे की मानो पूजा कर रहे थे ॥३८-३९॥ वह सन्निकट में आये हुए लोगों के प्रति सद्भावना के कारण पुष्पों के समूह को मानो शोभा के लिए बिछाया गया हो॥४ ०॥ वसन्त की शोभा को प्राप्त करके पुष्प की शोभा के भार से झुके हुए शिरों वाले वायु के द्वारा कंपाये गये
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