Srishti Khanda Extracted Page 177

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-177

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Sanskrit Original

स्मरामि नित्यं पुरुषं वरेण्यं नारायणं निष्प्रतिमं पुराणम् । परात्परं पूर्वजमुग्रवेगं गंभीरगंभीरधियांप्रधानम् ॥९३९॥ नतोस्मि देवं हरिमीशितारं परात्परं धामपरं च धाम । परापरं तत्परमं च धाम परापरेशं पुरुषंविशालम् ॥१४०॥ नारायणं स्तौमि विशुद्धभावं परात्परं सूक्ष्ममिदं ससर्ज । सदास्थितत्वात्पुरुषप्रधानम् शांतं प्रधानं शरणं ममास्तु ॥१४१॥ नारायणं वीतमलं पुराणं परात्परं विष्णुमपारपारम् । पुरातनं नीतिमतां प्रधानं धृतिक्षमाशांतिपरं क्षितीशम् ॥९४२॥ शुभं सदास्तौमि महानुभावं सहस्त्रमूद्धिनमनेकपादम् । अनंतबाहुं शशिसूर्यनेत्रं क्षराक्षरं क्षीरसमुद्रनिद्रम् ॥९४३॥ नारायणं स्तौमि परंपरेशं परात्परं यत्त्रिदशैरगम्यम् । त्रिसर्गसंस्थं त्रिहुताशनेत्रं त्रितत्वलक्ष्यं त्रिलयं त्रिनेत्रम् ॥१४४॥ नमामि नारायणमप्रमेयं कृते सितं द्वापरतश्च रक्तम् । कलौ च कृष्णं तमथो नमामि ससर्ज योवक्त्रत एवविप्रान् ॥१४५॥ भुजांतरात्क्षत्रमथोरुयुग्माद्विशः पदाग्राच्च तथैव शूद्रान् । नमामि तं विश्वतनुं पुराणं परात्परं पारगमप्रमेयम् ॥१४६॥ सूकष्ममूर्ति महामूर्ति विद्यामूर्तिममूर्तिकम्। कवचं सर्वदेवानां नमस्ये वारिजेक्षणम् ॥१४७॥ RS — अत्यन्त प्रणत होकर शंख, चक्र तथा गदा धारण करने वाले भगवान् विष्णु की स्तुति किए । रुद्र ने कहा-- श्रेष्ठो से भी श्रेष्ठ, अमृत स्वरूप, पुराण पुरुष, परात्पर, अनन्त पराक्रम सम्पन्न भगवान् विष्णु का ॥१३८॥ में स्मरण करता हूँ, नित्य, तथा वरेण्य पुरुष, अप्रतिम पुराण पुरुष का मैं चिन्तन करता हूँ । परात्पर पूर्वज, उग्रवेग वाले गम्भीर बुद्धि वाले प्रधान (भगवान् विष्णु) का में चिन्तन करता हूँ ॥१३९॥ सम्पूर्ण जगत् का नियम न करने वाले, परात्पर तथा परधाम स्वरूप भगवान् श्रीहरि को मैं प्रणाम करता हूँ । पर एवं अपर तत्त्वों के आश्रय पर एवं अपर तत्त्वो के स्वामी विशाल पुरुष ॥१४०॥ विशुद्ध भाव स्वरूप पर, अपर तथा सूक्ष्म तत्त्वों की जिन्होंने सृष्टि की में उन भगवान् नारायण की स्तुति कर रहा हूँ । जो पुरातन तत्त्व हैं, नीतिज्ञो में प्रधान, धृति ( धेर्य), क्षमा, शान्ति तथा त्रिपादविभूति के स्वामी ॥१४२॥ सदा शुभ स्वरूप महान प्रभाव वाले अनन्त शिरों तथा अनेक चरणों वाले, अनन्त भुजाओं वाले, जिनके चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं, क्षर एवं अक्षर शरीरक तथा क्षीरसागर में शयन करने वाले भगवान् नारायण की मैं स्तुति करता हूँ ॥१४३॥ परतत्त्व, परेश, परात्पर तत्त्व तथा जिनको देवता भी नहीं जान पाते हैं त्रिसर्ग में स्थित रहने वाले तीनों अग्नियाँ, जिनके नेत्र हैं, तीनो तत्त्वों (चेतन, अचेतन एवं ईश्वर) के लक्ष्य स्वरूप तीनों प्रकार के (नैमित्तिक, प्राकृतिक तथा आत्यन्तिक) लयस्वरूप तीन (सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि ही जिनके नेत्र हैं) ऐसे भगवान् नारायण की मैं स्तुति करता हूँ ॥१४४॥ जिनका सत्ययुग में वर्ण श्वेत होता है, द्वापर में रक्त वर्ण का वर्ण होता है तथा जो कलियुग में कृष्ण वर्ण वाले होते हैं तथा जिन्हांने अपने मुख से ही ब्राह्मणों की सृष्टि की, अपनी भुजाओं से क्षत्रियों की जिन्होंने सृष्टि की, दोनों जंघाओं से वैश्यों की सृष्टि तथा अपने पैरों के अग्रभाग से शुद्रो की सृष्टि की; ऐसे भगवान् नारायण को मैं नमस्कार करता हूँ । मैं उन्हीं विश्व शरीरक पुराण पुरुष, परात्पर तत्त्व, पारंगत

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