Srishti Khanda Extracted Page 176
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-176
Sanskrit Original
जलजोत्फुल्लपत्राक्ष जय देवपितामह । त्वयाह्युत्पादितः पूर्व॑ सृष्ट्यर्थमहमीश्वर ॥१२५॥ यज्ञाहुति सदाहार यज्ञांगेश नमोस्तु ते । स्वर्णगर्भ पडागर्भ देवगर्भं प्रजापते॥१२६॥ त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारः स्वधा त्वं पद्मसंभव । वचनेन तु देवानां शिरश्जिन्नं मया प्रभो ॥१२७॥ ब्रह्महत्याभिभूतोस्मि मां त्वं पाहि जगत्पते । इत्युक्तो देवदेवेन ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ॥१२८॥ ब्रह्मोवाच सखा नारायणो देव: सत्वां पूतं करिष्यति। कीर्तनीयस्त्वया धन्यः स मे पूज्यः स्वयं विभुः॥९२९॥ अनुघ्यातोऽसि वै नूनं तेन देखेन विष्णुना । येन ते भक्तिरुत्पन्ना स्तोतु मां मतिरुत्थिता ॥१३०॥ शिरश्ेदात्कपाली त्वं सोमसिद्धांतकारकः । कोटीः शतं च विप्राणामुद्धर्तासि महाद्युते ॥१३९॥ ब्रह्महत्याव्रतं कुर्यात् नान्यत्किचन विद्यते । अभाष्याः पापिनः क्रूरा ब्रह्मघ्नाः पापकारिण:॥९ ३ २॥ वैतानिका विकर्मस्था न ते भाष्या: कथंचन । तैस्तु दृष्टेस्तथाकार्य॑ भास्करस्यावलोकनम्॥१३३॥ अंगस्पर्शे कृते रुद्र सचैलो जलमाविशेत् । एवं शुद्धिमवाप्रोति पूर्वदृष्टं मनीषिभिः ॥१३४॥ सभवान्ब्रह्महन्तासि शुद्ध्यर्थ व्रतमाचर । चीर्णे ब्रते पुनर्भूयः प्राप्स्यसि त्वं वरान्बहून् ॥१३५॥ एवमुक्त्वागतो ब्रह्मारुद्रस्तन्नाभिजज्ञिवान्। अचिंतयत्तदा विष्णुं ध्यानगत्या ततः स्वयम् ॥९३६॥ लक्ष्मीसहायं वरदं देवदेवं सनातनम्। अष्टांगप्रणिपातेन देवदेवस्त्रिलोचनः ॥१३७॥ तुष्टाव प्रणतो भूत्वा शंखचक्रगदाधरम् । रुद्र उवाच परंपराणाममृतं पुराण परात्परं विष्णुमनंतवीर्यम् ॥१३८॥ HPS NC PO ES-ES SS NEN COD ci वाले ब्रह्माजी आपको नमस्कार है ॥१२४॥ हे विकसित कमलदल के समान मनोहर नेत्र वाले, देव, हे पितामह ! हे ईश्वर ! आपने ही प्राचीन काल में मुझको सृष्टि करने के लए उत्पन्न किया था ॥१२५॥ सदा यज्ञ की आहुति का आहार करने वाले, यज्ञांगेश आपको नमस्कार है । हे स्वर्ण (हिरण्य) गर्भ, पद्मगर्भ (कमल से उत्पन्न होने वाले) देवगर्भ तथा प्रजापते !॥१२६॥ हे ब्रह्माजी देवताओं के कहने से ही मैने शिर को काटा है ॥१२७॥ मैं ब्रह्महत्या से निस्तेज हो गया हूँ, हे प्रजापते ! आप मेरी रक्षा करें । शङ्करजी से इस प्रकार कहे जाने पर ब्रह्माजी ने कहा॥१२८॥ ब्रह्माजी ने कहा--- भगवान् नारायण के सखा नर तुमको निष्पाप बनायेंगे । तुम उनकी ही स्तुति करो वे धन्य हैं वे मेरे भी पूज्य हैं । वे स्वयं व्यापक हैं ॥१२९॥ निश्चित रूप से तुम भगवान् विष्णु के द्वारा अनुगृहीत हुए हो । उसी के कारण तुममें मेरी स्तुति करने वाली बुद्धि उत्पन्न हुयी है ॥१३०॥ शिर काटने के कारण तुम कपाली होसोम सिद्धान्त को करने वाले, तथा हे महाद्युते ! तुम सैकड़ो करोड़ ब्राह्मणों का उद्धार करने वाले हो ॥१३ १॥ तुम्हे ब्रह्महत्यात्रत को करना चाहिए । ब्रह्मघ्न पापी होते हैं तथा क्रूर पापियों से बातें नहीं करनी चाहिए ॥१३२॥ जो वैतानिक तथा निन्दित कर्म करने वाले हैं, उन सबों से कभी बात नही करनी चाहिए । यदि ऐसे लोग देख लें तो शुद्धि के लिए सूर्य का दर्शन करना चाहिए ॥१३३॥ यदि उससे अङ्ग का स्पर्श हो जाय तो वस्र पहनकर ही जल में प्रवेश करके स्नान कर लेना चाहिए । इस प्रकार से ही शुद्धि मानीषियों ने बतलाया है ॥१३४॥ रुद्र आप ब्रह्महन्ता हे, अतएव अपनी शुद्धि के लिए ब्रत करे । ब्रत पूरा होने पर तुम अनेक प्रकार के वरदानों को प्राप्त करोगे। १३५।। इसतरह से कहकर ब्रह्माजी चले गये, किन्तु शङ्करजी स्वयं लक्ष्मीजी से विशिष्ट वर देने वाले देवाराध्य, भगवान् विष्णु का ध्यान करने लगे । साष्टाङ्ग प्रणिपात पुरस्सर देवराध्य शङ्करजी ॥१३६-१३७॥
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