Srishti Khanda Extracted Page 173

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-173

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Sanskrit Original

श्रीपद्यमहापुराण किमेष माधवाज्जात उताहोस्वेन कर्मणा । उतरुद्रेणजनितो ह्थवा बुद्धिपूर्वकम् ॥८६॥ ब्रह्नन् हिरण्यगर्भो$ थमंडजातश्चतुर्मुख: । आद्धुतं पञ्चमं तस्य वक्त्रं तत्कथमुत्थितम् ॥८७॥ सत्वे रजो न दृश्येत न सत्वं रजसि क्वचित् । सत्वस्थो भगवान््रह्म कथमुद्रेकमादधात् ॥८८॥ मूढात्मना नरो येन हंतुं हि प्रहितो हरम् । पुलस्त्य उवाच | महेश्वरहरीचैतो द्वावेव सत्पथि स्थितौ ॥८९॥ तयोरविदितं नास्ति सिद्धासिद्धं महात्मनोः। ब्रह्मणः पञ्चमं वक्त्रमूर्ध्वमासीन्महात्मनः ॥९०॥ ततो ब्रह्माऽ भवन्मूढो रजसा चोपबृंहितः । ततोऽयं तेजसासृष्टिममन्यमया कृता ॥९१॥ मत्तोऽन्यो नास्ति वै देवो येनसृष्टिः प्रवर्तिता । सहदेवाः सगंधर्वाः पशुपक्षिमृगाकुला ॥९२॥ एवंमूढः स॒ पंचास्यो विरिंचिरभवत्पुनः । प्राग्तक्त्रं मुखमेतस्य ऋग्वेदस्य प्रवर्तकम् ॥९३॥ द्वितीयं वदनं तस्य यजुर्वेदप्रवर्तकम् । तृतीयं सामवेदस्य अथर्वार्थंचतुर्थकम्॥९४॥ सांगोपांगेतिहासांश्च सरहस्यान्ससंग्रहान् । वेदानधीतेवक्त्रेण पंचमेनोदर्ध्वं चक्षुषा ॥९५॥ तस्यासुरसुराः सर्वे वक्त्रस्याद्धुतवर्चसः । तेजसा न प्रकाशंते दीपाः सूर्योदये यथा॥९६॥ स्वपुरेष्वपि सोद्वेगा ह्यावर्ततविचेतसः। न कंचिद्रणयेच्चान्यं तेजसाक्षिपते परान् ॥९७॥ नाभिगंतुं न च द्रष्टुं पुरस्तान्नोपसर्पितुम्। शेकुस्रस्ताः सुरास्सर्वे पद्मयोनिं महाप्रभुम् ॥९८॥ अभिभूतमिवात्मानं मन्यमाना हतत्विषः । सर्वे ते मंत्रयामासुरदैवताहितमात्मनः ॥९९॥ प्राप्त करता है । भीष्मजी ने कहा-- कपाल से जो धनुर्धारण किए वह नर उत्पन्न हुआ उसका निर्माण भगवान् माधव ने किया था अथवा वह अपने कर्म के कारण उत्पन्न हुआ था । अथवा उसे रुद्र ने बुद्धि पूर्वक उत्पन्न कर दिया था ॥८५-८६॥ हे ब्रह्मन ! हिरण्यगर्भ चार मुख वाले ब्रह्माजी अण्ड से उत्पन्न हुए थे ऐसी स्थिति में उनका पाञ्चवाँ मुख आश्चर्यमय है । वह कैसे उत्पन्न हुआ ?॥८७॥ कहीं भी सत्वगुण में रजोगुण नहीं दिखता है और न तो रजोगुण में सत्त्वगुण दिखता है । ब्रह्माजी तो सत्त्वस्थ पुरुष हैं, उनमें रजोगुण का उद्रेक कैसे हो गया ?॥८८॥ जिसके कारण मूढ बने हुए ब्रह्माजी स्वेदज पुरुष को शङ्करजी को मारने के लिए भेज दिए । पुलस्त्य महर्षि ने कहा- महेश्वर तथा श्रीहरि ये दोनों सन्मार्गगामी हें ॥८९॥ उन दोनों को कोई भी सिद्ध अथवा असिद्ध आज्ञात नहीं है । ब्रह्माजी का पाँचवाँ मुख ऊपर की ओर था ॥९०॥ उसी के कारण रजोगुण के उद्रिक्त हो जाने से ब्रह्माजी मूढ हो गये । उसके कारण वे यह मानने लगे कि तेजस्विनी सृष्टि मेरे द्वारा की गयी है ॥९ १॥ अतएव मुझको छोड़कर सृष्टि करने वाला दूसरा कोई नहीं है । देवताओं, गन्धर्वो, पशु-पक्षी तथा मृग सबों की सृष्टि मैंने कीहै ॥९२॥ इसतरह से पाञ्चमुख वाले ब्रह्माजी मूढ हो गये । ब्रह्माजी का आगे का मुख ऋग्वेद का प्रवर्तक है ॥९३॥ उनका दूसरा मुख यजुर्वेद का प्रवर्तक है । तीसरा मुख सामवेद का प्रवर्तक है और चौथा मुख अथर्ववेद का प्रवर्तक है।।९४।। अपने ऊपर की ओर विद्यमान मुख के नेत्र से ब्रह्माजी साङ्गोपाङ्ग इतिहासों को तथा रहस्यों (उपनिषदों) तथा सग्रहों (वेदाङ्गो) के साथ वेदों का अध्ययन करते थे ।।९५॥ देवता तथा असुर सभी उस अद्भुत तेज: सम्पन्न मुख के तेज से उसी तरह से प्रकाशित नहीं होते थे जिस तरह सूर्योदय हो जाने पर दीपक नहीं प्रकाशित होता है ॥९६॥ वे अपने नगरों में भी सदा उद्विग्न तथा अचेत बने रहते थे । ब्रह्माजी अपने सामने किसी को भी नहीं गिनते थें वे अपने तेज से दूसरों को क्षुब्ध ही करते थे ॥९७॥ ब्रह्माजी से सभी देवता उद्विग्न ही होते रहते थे वे ब्रह्माजी का

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