Srishti Khanda Extracted Page 170

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-170

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Sanskrit Original

विस्फारितधनुः शब्दं नादिताऽशेषभूतलम् । कवचं स्वेदजस्यैकं रक्तजेनत्वपाकृतम् ॥४१॥ एवं समेतयोर्युद्धे दिव्यं वर्षद्वयं तयोः । युध्यतोः समतीतं च स्वेदरक्तजयोर्न्ृप ॥४२॥ रक्तजंद्विभुजं दृष्ट्वास्वेदजंचैवसंगतौ । विचिन्त्यवासुदेवोगाद्वृह्मणः सदनं परम् ॥४३॥ ससंभ्रममुवाचेदं ब्रह्माणं मधुसूदनः । रक्तजेनाद्यभोब्रह्मन्स्वेदजोऽ यं निपातितः ॥४४॥ श्रुत्वैतदाकुलो ब्रह्मा बभाषे मधुसूदनम् । हरेद्यजन्मनि नरो मदीयो जीवतादयम्।॥४५॥ तथा तुष्टोब्रवीत्तंच विष्णुरेवं भविष्यति । गत्वातयोरणमपि निवार्याह च तावुभौ ॥४६॥ अन्यजन्मनि भविता कलिद्वापरयोर्मिथः । संधौ महारणे जाते तत्राहंयोजयामि वाम् ॥४७॥ विष्णुना तु समाहूय ग्रहेश्वरसुरेश्वरौ। उक्ताविमौ नरौ भद्रौ पालनीयौ ममाज्ञया ॥४८॥ सहस्त्रांशोस्वेदजोऽ यं स्वकीयोंशो धरातले । द्वापारांते वतार्योऽयं देवानां कार्यसिद्धये ॥४९॥ यदूनां तु कुले भावी शूरो नाममहाबलः । तस्य कन्या पृथा नाम रूपेणाप्रतिमाभुवि ॥५०॥ उत्पस्यति महाभागा देवानां कार्यसिद्धये । दुर्वासस्तु वरं तस्यै मंत्रग्रामंप्रदास्यति ॥५१॥ मंत्रेणानेन यं देवं भक्तया आवाहयिष्यति । देवि तस्य प्रसादात्तु तव पुत्रो भविष्यति ॥५२॥ सा च त्वामुदये दृष्ट्वा साभिलाषा रजस्वला। चिंताभिपन्ना तिष्ठंती भजितव्या विभावसो ॥५३॥ तस्या गर्भे त्वयं भावी कानीनः कुंतिनंदनः । भविष्यति सुतो देवदेवकार्यार्थ सिद्धये ॥५४॥ तथेति चोक्त्वा प्रोवाच तेजोराशिर्दिवाकरः । पुत्रमुत्पादयिष्यामि कानीनं बलगर्वितम् ॥५५॥ वहाँ से अन्तर्धान हो गये । उसके बाद नारायण के समक्ष ही नर ने ॥३९॥ उसको आपने बायें पैर से मारा ऐसा करते ही वह महाबलवान रौद्र पुरुष उठ खड़ा हुआ । उसके बाद उन स्वेदज तथा रक्तज दोनों पुरुषों में महान् युद्ध हुआ ॥४०॥ धनुष के टङ्कार से सारा भूलोक निनादित हो गया उसके बाद रक्तज पुरुष ने स्वेदज पुरुष के एककवच को तोड़ दिया ।।४१॥ हे राजन् ! इस तरह से परस्पर में स्वेदज तथा रक्तज पुरुषों के युद्ध करते हुए देवताओं के दो वर्ष बीत गये ॥४२। स्वेदज तथा रक्तज दोनों को दो भुजाओं वाला देखकर विचार करके भगवान् वासुदेव ब्रह्माजी के धाम में गये ॥४३॥ उसके बाद भगवान् मधुसूदन ने ब्रह्माजी से कहा हे ब्रह्मन् ! आज रक्तज ने स्वेदज पुरुष को मार दिया ॥४४॥ इसतरह से सुनकर ब्रह्माजी व्याकुल हो गये । उन्होंने मधुसूदन से कहा हे हरे ! यह मेरा नर इस जन्म में जीवित हो जाय ॥४५॥ उससे प्रसन्न होकर विष्णु ने कहा ऐसा ही होगा । वहाँ जाकर भगवान् विष्णु ने उन दोनों के युद्ध को रोक कर उन दोनों से कहा ॥४६॥ दूसरे जन्म में कलियुग तथा द्वापर केसंधिकाल में महायुद्ध होगा, उस समय मैं तुम दोनों को आमने सामने मिलाऊंगा ॥४७॥ उसके बाद विष्णु ने ग्रहेश्वर तथा सुरेश्वर (सूर्य तथा इन्द्र) को बुलाकर कहा इन दोनों भद्र पुरुषों का आपलोग पालन करेंगे । यह मेरी आज्ञा है॥४८॥ हे सूर्य ! यह स्वेदज पुरुष है इसको आप द्वापर के अंत में अपने अंश से पृथिवी पर देवताओं का कार्य करने के लिए अवतीर्ण करायेंगे ॥४९।। यदुओं के वंश में शूर नामक महाबलवान् राजा होंगे । उनकी अप्रतिम सुन्दरी पृथा नाम की पुत्री होगी ॥५०॥ वह महाभागा देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए उत्पन्न होयेगी । उसको महर्षि दुर्वासा वरदान रूप से मन्त्र समूह को प्रदान करेंगे ॥५१॥ उस मन्त्र के द्वारा वह देवी जिस देवता का आवाहन करेगी, उसी की कृपा से उसके पुत्र उत्पन्न होंगे ॥५२॥ रजस्वला वह आपको उदय काल में देखकर आपका आवाहन करेगी । हे सूर्य ! उस चिन्ता करती हुयी पृथा को आप अपनायेंगे ॥५३॥ उसी के गर्भ से यह कानीन कुन्तिनंदन होगा । हे देव ! देवकार्य के लिए उसका यह पुत्र उत्पन्न होगा ॥५४॥ ठीक है, कहकर तेजोराशि

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