Srishti Khanda Extracted Page 169

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-169

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Sanskrit Original

शड श्रीपद्ममहापुराण पुरुषो वह्विसंकाशः कपाले संप्रदृश्यते । तं दृष्ट्वा भगवान्विष्णुः प्राह रुद्रमिदंवचः ॥२५॥ कपाले भव कोवाऽयं प्ररादुर्भूतोऽ भवन्नरः । वचः श्रुत्वा हरेरीशस्तमुवाच विभो श्रृणु ॥२६॥ नरो नामैष पुरुषः परमास्त्रविदांवरः । भवतोक्तो नर इति नरस्तस्माद्भविष्यति ॥२७॥ नरनारायणौ चोभौ युगे ख्यातौ भविष्यतः । संग्रामे देवकार्येषु लोकानां परिपालने ॥२८॥ एष नारायणसखो नरस्तस्माद्भविष्यति। अथासुरवधे साहां तव कर्ता महाद्युतिः॥२९॥ मुनिर्ज्ञानपरीक्षायां जेतालोके भविष्यति । तेजोधिकमिदं दिव्यं ब्रह्मणः पंचमं शिरः॥३०॥ तेजसो ब्रह्मणो दीप्ताद्धुजस्य तवशोणितात् । मम दृष्टिनिपाताच्च त्रीणितेजांसि यानि तु ॥३९॥ तत्संयोगसमुत्पन्नः शत्रुं युद्धे विजेष्यति । अवध्या ये भविष्यन्ति दुर्जया अपि चापरे ॥३२॥ शक्रस्य चामराणां च तेषामेषभयङ्करः । एवमुक्त्वा स्थितः शंभुर्विस्मितश्च हरिस्तदा ॥३३॥ कपालस्थः स तत्रैव तुष्टाव हरकेशवौ । शिरस्यंजलिमाधाय तदा वीर उदारधीः ॥३४॥ किं करोमीति तौ प्राह इत्युक्त्वा प्रणतः स्थितः । तमुवाच हरः श्रीमान् ब्रह्मणास्वेन तेजसा॥३५॥ . सृष्टो नरो धनुष्पाणिस्त्वमेनं तु निषूदय। इत्थमुक्तांजलिधरं स्तुवंतं शंकरो नरम् ॥३६॥ तथैवाञ्जलिसंबद्धं गृहीत्वा च करद्वयम् । उद्धृत्याथकपालात्तं पुनर्वचनमब्रवीत् ॥३७॥ स एष पुरुषो रौद्रो यो मया वेदितस्तव । विष्णुहुंकाररचितमोहनिद्रां प्रवेशितः ॥३८॥ विबोधयैनं त्वरितमित्युक्त्वान्तर्दधे हरः । नारायणस्य प्रत्यक्षं नरेणानेन वै तदा ॥३९॥ वामपादहतः सोऽपि समुत्तस्थौ महाबलः । ततो युद्धं समभवत्स्वेदरक्तजयोर्महत् ॥४०॥ RES उसके बाद उससे किरीट धारण किए हुए तथा धनुर्धारी पुरुष पैदा हुआ । वह अपने पीठ पर दो तुणीरों को बाँधे था उसका कन्था मोटा था तथा वह अङ्गुलित्र धारण किए था । इस प्रकार का पुरुष उस कपाल में दिखायी पड़ा । उस पुरुष को देखकर भगवान् विष्णु ने रुद्र से कहा ॥२४-२५॥ हे शङ्कर कपाल में यह कौन सा नर उत्पन्न हो गया है? श्रीहरि की वाणी सुनकर श्रीशङ्करजी ने कहा हे नाथ आप सुनें ॥२६॥ ये नर नामक पुरुष हैं, तथा ये श्रेष्ठ अखों के ज्ञाता हैं । आपने इन्हें नर कहा है अतएव इनका नाम नर होगा ॥२७॥ कलियुग में नर और नारायण दोनों विख्यात होंगे । संग्राम में, देवताओं का कार्य करने में, तथा लोकों की रक्षा करने में ॥२८॥ ये नारायण के सखा नर होंगे । ये महाद्युति असुरों का वध करने में आपकी सहायता करेंगे ॥२९॥ ज्ञान की परीक्षा में ये मुनि विजयी होंगे । यह ब्रह्मा का पाँचवाँ शिर अधिक तेज से युक्त है ॥३०॥ ब्रह्माजी के देदीप्यमान तेज से आपकी भुजा के शोणित से तथा मेरी दृष्टि के पड़ने से ये तीन तेज से युक्त होंगे ॥३१॥ उन तेजों के संयोग के कारण युद्ध में शत्रुओं पर विजय प्राप्त करेंगे । जो असुर देवताओं तथा इन्द्र के लिए अवध्य तथा दुर्जय भी होंगे । उनके लिए भी ये भयङ्कर होंगे । इसतरह शङ्करजी तथा श्रीहरि विस्मित हो गये ॥३२-३३॥ उस समय शिर से अंजलि को लगाकर वही पर कपालस्थ पुरुष ने शङ्करजी तथा श्रीहरि की स्तुति की ॥३४॥ उसने उन दोनों से पूछा कि मैं आपलोगों की कौन सी सेवा करूँ ? यह कहकर वह उनके समक्ष विनम्र होकर खड़ा हो गया । उस समय शङ्करजी ने कहा ब्रह्माजी ने जिसे अपने तेज से उत्पन्न किया है ॥३५॥ उस धनुर्धारी पुरुष को तुम मार दो इसतरह से कहकर अंजलि बाँधे हुए तथा स्तुति करने वाले नर को शङ्करजी ने ॥३६॥ उसी तरह अज्जलि बाँधे हुए नर के दोनों हाथों को पकड़कर कपाल से बाहर निकल कर फिर कहा ॥३७॥ यही वह रौद्र पुरुष है जिसके विषय में मैंने तुमसे कहा है । भगवान् विष्णु के हुंकार से यह मोहनिद्रा में पड़ा हुआ है ॥३८॥ इसको तुम शीघ्र जगा दो, यह कहकर शङ्करजी

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