Srishti Khanda Extracted Page 167
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-167
Sanskrit Original
चौदहवाँ अध्याय भीष्म उवाच कर्थं त्रिपुरुषाज्जातोहार्जुनः परवीरहा । कथं कर्णस्तु कानीनः सूतजः परिकीर्त्यते ॥१॥ वैरं तयोः कथं भूतं निसगदिव तद्दद। बृहत्कौतूहलं मह्यं तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥२॥ पुलस्त्य उवाच छिन्ने वक्त्रे पुरा ब्रह्मा क्रोधेन महता वृतः । ललाटे स्वेदमुत्पन्नं गृहीत्वा ताडयद्धुवि ॥३॥ स्वेदतः कुंडली जज्ञे सधनुष्को महेषुधिः। सहस्रकवची वीरः किं करोमीत्युवाच ह॥४॥ तमुवाच विरिंचस्तु दर्शयन्रुद्रमोजसा । हन्यतामेष दुर्बुद्विर्जायते न यथा पुनः ॥५॥ ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा धनुरुद्यम्य पृष्ठतः । संप्रतस्थे महेशस्य ब्राणहस्तोतिरौद्रदृक् ॥६॥ दृष्ट्वा पुरुषमत्युग्रं भीतस्तस्य त्रिलोचनः । अपक्रांतस्ततो वेगाद्विष्णोराश्रमभ्यगात् ॥७॥ राहि त्राहीति मां विष्णो नरादस्माच्च शत्रुहन् ।ब्रह्मणा निर्मितः पापो म्लेच्छरूपो भयंकरः ॥८॥ यथा हन्यान्नमां क्रुछस्तथा कुरु जगत्पते । हुंकारध्वनिना विष्णुमॉहयित्वा तु तं नरम् ॥९॥ अदृश्यः सर्वभूतानां योगात्मा विश्वदृक्प्रभुः । तत्र प्राप्तं विरूपाक्षं सांत्वयामास केशवः ॥१०॥ अर्जुन एवं कर्ण की उत्पत्ति, दोनों में वैर, शिवजी के द्वारा शिर काट दिए जाने से क्रुद्ध ब्रह्मा के पसीने से पाप पुरुष की उत्पत्ति, उससे भयभीत शिव का विष्णु के शरण में जाना, विरूपाक्ष के माँगने पर विष्णु द्वारा उसको अपनी दाहिनी भुजा का प्रदान, भुजा के कटने से उत्पन्न रक्त से भिक्षापात्र की पूर्ति, स्वेदज और रक्तज पुरुषों का परस्पर में युद्ध, विष्णु की आज्ञा से उन दोनों की सूर्य तथा शक्र द्वारा रक्षा और द्वापर के अन्त में पृथा के गर्भ से उन दोनों की कर्ण तथा अर्जुन रूप से उत्पत्ति, ब्रह्मा की आज्ञा से शिवजी द्वारा विष्णु की स्तुति, शिवजी की तीर्थ यात्रा, पुष्कर में शिवजी द्वारा कापालिक व्रत, कापाल मोचन तीर्थ की उत्पत्ति, शङ्करजी का वाराणसी गमन भीष्मजी ने पूछा-- शत्रुओं को मारने वाले अर्जुन की तीन पुरुषों से कैसे उत्पत्ति हुयी ? कानीन कर्ण को सूत पुत्र क्यों कहा जाता है ? उन दोनों में स्वाभाविक वैर क्यों हुआ ? इस विषय में मुझे बहुत अधिक कौतूहल है, उसे आप मुझे बतलायें ।।२॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- शङ्करजी द्वारा पांचवे मुख के काट दिए जाने पर ब्रह्माजी को बड़ा क्रोध हुआ, उसके कारण ब्रह्माजी के ललाट से पसीना निकला, उन्होंने उस पसीने को पृथिवी पर पटक दिया तो उस पसीने से विशाल धनुष बाण धारी, कुण्डलधारण किए हुए, हजारो कवच पहने हुए एक वीर पुरुष उत्पन्न हुआ। उसने ब्रह्माजी से पूछा में क्या करूँ ।।३-४॥ रुद्र को दिखाते हुए ब्रह्माजी ने उससे कहा तुम इसे मार दो जिससे यह पुन: उत्पन्न न हो ॥५॥ ब्रह्माजी की बात को सुनकर पीठ पर धनुष बाँधकर बाणधारी वह पुरुष शिवजी का पीछा करने लगा । उस उग्र पुरुष को देखकर शङ्करजी भयभीत हो गये । वे वहाँ से वेग से भगे तथा भगवान् विष्णु के आश्रम (बदरिकाश्रम) में आये ॥७॥ उन्होंने कहा-- हे शत्रुहन् विष्णो ! आप इस मनुष्य से मेरी रक्षा करें । इस भयङ्कर पापी म्लेच्छ का निर्माण ब्रह्माजी ने किया है । हे जगत्पते ! आप ऐसा करें कि यह मुझको मार न सके । उसके बाद भगवान् विष्णु ने अपनी हुंकार ध्वनि से उस पुरुष को मूर्छित कर दिया ॥९॥ सभी जीवों से अदृश्य रहने वाले योगी, सर्वज्ञ भगवान् ने वहाँ पर आये हुए विरूपाक्ष (शिवजी) को सान्त्वना प्रदान किया ॥१०॥ उसके 5
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