Srishti Khanda Extracted Page 164

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-164

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Sanskrit Original

एतान् दीक्षय भोब्रह्मम्वचनान्मम पुत्रकान् । गते मोहे दानवास्ते भार्गवं वाक्यमन्रुवन्॥३७५॥ देहि दीक्षां महाभाग सर्वसंसारमोचनीम् । तथेत्याहोशना दैत्यान्ाच्छामो नर्मदामनु ॥३७६॥ भोभोस्त्यजतवासांसि दीक्षां कारयितास्मि वः । एवं ते दानवा भीष्म भृगुरूपेण धीमता ॥३७७॥ आंगिरसेन ते तत्र कृता दिग्वाससोऽ सुराः । बर्हिपिच्छध्वजं तेषां गुंजिकां चारुमालिकाम् ॥३७८॥ दत्वा चकार तेषां तु शिरसोलुंचनं ततः । केशस्योत्पाटनं चैव परमं धर्मसाधनम् ॥३७९॥ धनानामीश्वरो देवो धनदः केशलुंचनात् । सिद्धिं परमिकां प्राप्ताः सदावेषस्य धारणात् ॥३८ ०॥ नित्यत्वं लभ्यते होवं पुरा प्राहार्हतः स्वयम्। बालोत्पाटेन देवत्वं मानुषैर्लभ्यते त्विह ॥३८१॥ किं न कुर्वीत तत्तस्मान्महापुण्यप्रदं यतः । मनोरथो हि देवानां लोके वै मानुषे कदा ॥३८२॥ अस्मिन् स्याद्धारते वर्षे जन्मनः श्रावके कुले । तपसायुङ्महे स्मान्वै केशोत्पाटनपूर्वकम्॥३८३॥ तीर्थकराश्चतुर्विश त्तथातैस्तु पुरस्कृताः । छायाकृतं फणीद्रेण ध्यानमार्गप्रदर्शकम् ॥३८४॥ स्तुवन्तं मंत्रवादेन स्वर्गो हस्तगतोर्हतम्। मोक्षो वा भाविता नूनं विचारः कोऽत्र कथ्यते॥३८ ५॥ कदास्यामर्षयो भूत्वा सूर्याग्रिसमतेजसः। जप्त्वा विरगिणश्चैव मनुपंचांगकं तथा ॥३८६॥ तथा तपस्यतां मृत्युं गतानां कालपर्ययात् । पाषाणेन शिरोभग्नं भवते पुण्य कर्मणाम् ॥३८७॥ अरण्ये निर्जनेवासः कदावै भविता हि नः। कर्ण जप्यं श्रावकाश्च करिष्यंति समाहिताः ॥३८८॥ भो भो ऋषे न गतंव्यं मोक्षमार्गी यतो भवान्। लब्धानि यानि स्थानानि भूयोवृत्तिकराणि च ॥३८९॥ आप मेरे इन शिष्यों को दीक्षा प्रदान करें । इसतरह से कहकर मायामोह के चले जाने पर दानवों ने भार्गव (नकली शुक्राचार्य) से कहा ॥३७५॥ हे महाभाग ! सम्पूर्ण संसार से मुक्ति दिलाने वाली दीक्षा आप हमलोगों को दें । भार्गव ने भी कहा ठीक है; हमलोग नर्मदा के तट पर चलें । वहाँ जाकर भार्गव ने कहा-- आपलोग वस्त्र का परित्याग कर दे । मैं आपलोगों को दीक्षा देने वाला हूँ । हे भीष्म ! शुक्राचार्यरूपधारी बुद्धिमान् बृहस्पति ने उन असुरों को वस्त्रहीन बना दिया । मयूर पंख को उन सबों ने धारण कर लिया तथा गूंजे की सुन्दर माला सबों ने धारण कर ली॥३७८॥ इसके बाद बृहस्पति ने उन सबों के शिर के बाल को नोचा; केश को उखाड़ा जाना परम धर्म है।३७९॥ धन के स्वामी कुबेर देवता केशलुञ्चन के ही द्वारा धनद हो गये इसी वेष को सदा धारण करने के कारण वे परम सिद्धि को प्राप्त कर लिए ॥३८०॥ स्वयं आर्हत ने कहा-- कि ऐसा करने से नित्यत्व की प्राप्ति होती है । केशों के उखाड़ने की क्रिया से मनुष्य इस संसार में ही देवत्व को प्राप्त कर लेता है ॥३८१॥ यह क्रिया अत्यन्त पुण्यप्रद है अतएव इसे अवश्य करनी चाहिये । देवताओं का मनोरथ होता है कि कब मनुष्य लोक में।॥३८२॥ भारत वर्ष में हमलोगों का जन्म श्रावक वंश में होगा ? जिससे कि हमलोग भी केशोत्पाटन् पूर्वक तप से युक्त हो जायेंगे ॥३८३॥ चौबीस तीर्थकरों के द्वारा पुरस्कृत असुरों ! जिनके ऊपर शेषनाग छाया करते हैं, ऐसे वे मोक्षमार्ग के प्रदर्शक हैं॥३८४॥ मन्त्रवाद के द्वारा स्तुति करने से तो प्राप्त भी स्वर्ग नष्ट हो जाने वाला है अथवा मोक्ष भी विनष्ट हो जाय इस विषय में क्या विचार करना है 2॥३८५॥ कब वह बेला आयेगी ? जब सूर्य अथवा अग्नि के समान तेज से युक्त होकर तथा पाञ्च अङ्ग वाले मन्त्र का हम जप करके ॥३८५॥ इसतरह से तपस्या करते हुए मरने के बाद पुण्यकर्मा पुरुषों का ही शिर पाषाण से फोड़ा जाता है ॥३८७॥ कब हमलोग निर्जन वन में निवास कर पायेंगे ? और समाहित श्रावक (भिक्षु) हमारे कान में मन्त्रोंपदेश करेंगे ॥३८८॥ हे ऋषे ! आप जायँ आप तो मोक्षमार्ग के अनुयायी हैं । जिन स्थानों को हमलोगों ने प्राप्त किया है, वे तो पुन: सांसारिक वृत्ति उत्पन्न करने वाले

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