Srishti Khanda Extracted Page 145

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-145

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Sanskrit Original

न स मिथ्याभिशापेन अभिगभ्यश्च केनचित् । ऐक्ष्वाकी सुषुवे पुत्रं शूरमद्धुतमीढुषम् ॥१०७॥ मीढुषा जज्ञिरे शूरा भोजायां पुरुषा दश। वसुदेवो महाबाहुः पूर्वमानकदुंदुभिः ॥१०८॥ देवभागस्तथाजज्ञे तथादेवश्रवाः पुनः। अनावृष्टिं कुनिश्चैव नंदिश्चैव सकृद्यशाः॥१०९॥ श्यामः शमीकः सप्ताख्यः पंच चास्य वरांगनाः। श्रुतकीर्तिः पृथा चैव श्रुतदेवी श्रुतश्रवाः ॥११०॥ राजाधिदेवी च तथा पंचैता वीरमातरः । वृद्धस्य श्रुतदेवी तु कारूषं सुषुवे नृपम् ॥१११॥ कैकेयाच्छुतकीर्तेस्तु जज्ञे संतर्दनो नृपः। श्रुतश्रवसि चैद्यस्य सुनीथः समपद्यत ॥११२॥ राजाधिदेव्याः संभूतो धर्माद्भयविवर्ितः। शूरः सख्येन बद्धोसौ कुंतिभोजे पृथां ददौ ॥११३॥ एवं कुंती समाख्या च वसुदेवस्वसा पृथा । कुंतिभोजोददात्तां तु पांडोर्भार्यामनिंदिताम् ॥११४॥ पांण्ड्वर्थेऽसूत देवी सा देवपुत्रान्महारथान्। धर्माध्युष्टिष्ठिरो जज्ञे वाताज्जज्ञे वृकोदरः ॥११५॥ इंद्रा्धनंजयश्चैव शक्रतुल्यपराक्रमः । योऽसौ त्रिपुरुषाज्जातस्त्रिभिरंशैर्ममह।/रथः॥९९६॥ देवकार्यकरश्चैव सर्वदानवसूदनः । अवध्याश्चापि शक्रस्य दानवा येन घातिताः ॥१९७॥ स्थापितस्स तु शक्रेण लब्धवर्चास्त्रिविष्टपे । माद्रवत्यां तु जनितावश्विनाविति नः श्रुतम् ॥११८॥ नकुलः सहदेवश्च रूपसत्वगुणन्वितौ। रोहिणी पौरवी नाम भार्या चानकदुंद॒भेः ॥११९॥ लेभे चेष्टं सुतं रामं सारणं च रणप्रियम् । दुर्धरं दमनं चैव पिंडारकमहाहनुम्॥१२०॥ अथ माया त्वमावास्या देवकी या भविष्यति। तस्यां जज्ञे महाबाहुः पूर्वं तु सप्रजापतिः ॥१२९॥ रिष्टनेमि, सुवर्चा, सुधर्मा, मृदु ॥१०५॥ अभूमि तथा बहुभूमि । उनकी और दो स्त्रियाँ थी श्रविष्ठा तथा श्रवणा । जो व्यक्ति भगवान् के इस मिथ्या कलङ्क को जानता है उसको किसी प्रकार का कलङ्क नहीं लगता है । ऐक्ष्वाकी ने अद्भुत वीर पुत्र मीढुष को जन्म दिया ॥१०६-१०७॥ भोजा के गर्भ से मीढुष के दश वीर पुत्र उत्पन्न हुए । उनके नाम थे वसुदेव जो पहले आनकदुन्दुभि कहलाते थे ॥१०८॥ उनके अतिरिक्त देवभाग, देवश्रवा, अनावृष्टि, कुन्ति, नन्दि, सकृद्यशा, श्याम, शमीक तथा सप्त । उनकी पाँच पुत्रियाँ भी हुयीं श्रुतकोर्ति, पृथा, श्रुतदेवी, श्रुतश्रवा, तथा राजाधिदेवी । ये पाँचों वीरों की माताएँ थीं । श्रुतदेवी ने वृद्ध के पुत्र राजा कारूष को जन्म दिया ॥१०९-१११॥ श्रुतकीर्तिं के गर्भ से कैकेय के पुत्र राजा संतर्दन उत्पन्न हुए । श्रुतश्रवा के गर्भ से चैद्य का पुत्र सुनीथ पैदा हुआ॥११२॥ राजाधिदेवी के गर्भ से धर्म की पत्नी (अभिवर्दिता) का जन्म हुआ । शूर की राजा कुन्तिभोज से मित्रता थी, उन्होंने पृथा नामक अपनी पुत्री को कुन्तिभोज को गोद दे दिया ॥११३॥ इसीलिए वसुदेव की बहन पृथा का नाम कुन्ती हुआ । कुन्तिभोज ने पृथा को पाण्डु की पत्नी के रूप में प्रदान किया ॥११४॥।। कुन्ती ने पाण्डु के लिए महारथ देव पुत्रों को उत्पन्न किया । धर्म के अंश से युधिष्ठिर का जन्म हुआ और वायु के अंश से वृकोदर (भीम) का जन्म हुआ इन्द्र के अंश से अर्जुन (धनंजय) का जन्म हुआ । अर्जुन इन्द्र के समान पराक्रम सम्पन्न थे । ये तीनों तीन पुरुषों के अंश उत्पन्न महारथी थे ॥११५-११६॥ अर्जुन देवताओं का कार्य करने वाले तथा समस्त दानवों का वध करने वाले थे । अर्जुन ने उन दानवों का वध किया जो इन्द्र के लिए अवध्य थे ॥११७॥। तेज: सम्पन्न अर्जुन को इन्द्र स्वर्गलोक में ले गये थे हमने सुना है के माद्रवती (माद्री) के गर्भ से अश्विनी कुमारों के अंश से नकुल और सहदेव उत्पन्न हुए । ये दोनों सात्त्विक प्रकृति के तथा रूप एवं गुण से सम्पन्न थे । पुरुवंश में उत्पन्न रोहिणी आनकदुन्दुभि (वसुदेवजी) की पत्नी थीं ॥११८-११९॥ उन्होंने अपने प्रिय पुत्र बलरामजी को तथा रणप्रिय सारण को जन्म दिया । उनके दूसरे पुत्र दुर्धर, दमन, पिण्डारक तथा महाहनु भी थे ॥१२०॥ वसुदेवजी की पत्नी देवकी

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