Srishti Khanda Extracted Page 133

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-133

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Sanskrit Original

सर्वलोकेतिशयितं पुरूरवसमेव तम् । प्राह वच्री तु संतुष्टो नीयतामियमेव च ॥६९॥ सा पुरूरवसः प्रीत्यैचागायच्चरितं महत् । लक्ष्मीस्वयंवरे नाम भरतेन प्रवर्तितम्॥७०॥ मेनकां चोर्वशी रंभा नृत्यध्वमिति चादिशत् । ननर्त सलयं तत्र लक्ष्मीरूपेण चोर्वशी ॥७९॥ सा पुरूरवसं दृष्ट्वा नृत्यंती कामपीडिता । विस्मृताभिनयं सर्व यत्पुरातनचोदितम् ॥७ २॥ शशाप भरतः क्रोधाद्वियोगात्तस्य भूतले । पंचपंचाशदब्दानि लताभूता भविष्यसि ॥७३॥ ततस्तमूर्वशी गत्वा भरत्तरमकरोच्चिरम्। शापानुभवनांते च ऊर्वशी बुधसूनुना ॥७४॥ अजीजनत्सुतानष्टौ नामतस्तान्निबोध मे । आयुर्दृढायुर्वश्यायुर्बलायुर्ृतिमान्वसुः ॥७५॥ दिव्यजायुः शतायुश्च सर्वे दिव्यबलौजसः । आयुषो नहुषः पुत्रो वृद्धशर्मा तथैव च ॥७६॥ रजिर्दडो विशाखश्च वीराः पंचमहारथाः । रजेः पुत्रशतं जज्ञे राजेया इति विश्रुतम् ॥७७॥ रजिराराधयामास नारायणमकल्मषम् । तपसा तोषितो विष्णुर्वरं प्रादान्महीपतेः ॥७८॥ देवासुरमनुष्याणामभूत्सविजयी तदा। अथ देवासुरं युद््वमभूद्दर्षशतत्रयम् ॥७९॥ प्रह्लादशक्रयोभीमं नकश्चिद्विजयी तयोः। ततो देवासुरैः पृष्टः पृथब्देवश्चतुर्मुखः ॥८ ०॥ अनयोर्विजयी कः स्याद्रजिर्यत्रेति सोऽ व्रवीत् । जयाय प्रार्थितो राजा सहायस्त्वं भवस्व नः॥८ १॥ दैत्यैः प्राह यदि स्वामी वो भवामि ततस्त्वलम्। नासुरैः प्रतिपन्नं तत्प्रतिपन्नं सुरैस्तदा ॥८२॥ स्वामी भव त्वमस्माकं बलनाशय विद्विषः । ततोविनाशिताः सर्वे येऽवध्यावञ्रपाणिनः ॥८३॥ को अनेक प्रकार के आयुधों के प्रहार से परास्त करके, उर्वशी को लाकर पुरूरवा ने इन्द्र को प्रदान कर दिया । उसके कारण इन्द्र की पुरूरवा से मित्रता हो गयी ॥६६-६८॥ संसार में सबसे श्रेष्ठ वीर पुरूरवा से इन्द्र ने कहा इसको तुम ले जाओ ॥६९॥ उर्वशी ने पुरूरवा को प्रसन्न करने के लिए उसके महान चरित का गान भरत के द्वारा प्रेरित होकर लक्ष्मी स्वयम्बर में किया ॥७०।। उस नाटक में उन्होंने मेनका, उर्वशी तथा रम्भा को आदेश दिया कि तुमलोग नृत्य करो । वहाँ पर उर्वशी ने लयपूर्वक गीत गाते हुए लक्ष्मीरूप से नृत्य किया ॥७१॥ नृत्य करती हुयी वह पुरूरवा को देखकर कामार्त हो गयी और वह पूर्वोक्त सम्पूर्ण अभिनयों को भूल गयी ॥७२॥ उसके कारण क्रुद्ध होकर भरत मुनि ने शाप दे दिया कि उसका पृथिवी पर पुरूरवा से वियोग होगा । वह पचपन वर्षों तक लता के रूप में रहेगी ॥७३॥ उसके बाद उर्वशी राजा पुरुरवा के पास जाकर उन्हें अपना पति बना ली । जब शाप की समाप्ति हो गयी तो उर्वशी ने पुरूरवा के वीर्य से आठ पुत्रों का जन्म दिया । तुम उन सबों का नाम सुनो । आयु, दृढायु, वश्यायु, बलायु, धृतिमान, वसु ॥७४-७५॥ दिव्यायु तथा शतायु । ये आठो दिव्य बल और ओज से युक्त थे । आयु के पुत्र नहुष तथा वृद्धशर्मा, रजि, दण्ड, विशाख थे ये पाँचो वीर पुत्र महारथी थे । रजि के सौ पुत्र हुए । वे राजेय के नाम से विख्यात हुए ॥७६-७७॥ रजि ने भगवान् नारायण की आराधना की । उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने उन्हें वर प्रदान किया ॥७८॥ उसके बाद वे देवताओं, असुरों तथा मनुष्यो पर विजय, प्राप्त किए। उसके पश्चात् तीन सौ वर्षों तक देवासुर संग्राम होता रहा ॥७९॥ उसमें प्रह्माद तथा इन्द्र दोनों में से कोई भी विजय नहीं प्राप्त कर सका । उसके बाद देवताओं तथा असुरों ने अलग-अलग जाकर ब्रह्माजी से पूछा ॥८०॥ कि इन दोनों पक्षों में से कौन सा पक्ष विजयी होगा ? इस पर ब्रह्माजी ने कहा-- जिस पक्ष की ओर से रजि युद्ध करेंगे वही पक्ष विजयी होगा । उसके बाद दोनों पक्षों के लोगों ने जाकर राजा रजि से प्रार्थना किए कि आप हमारी सहायता करें। इस पर रजि ने कहा हम उसी पक्ष की सहायता करेंगे जो हमे अपना इन्द्र बनाये । इस पर दैत्यों ने इस शर्त को

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