Srishti Khanda Extracted Page 110

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-110

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

गोत्रं तथावर्द्धतां तु तथेत्युक्तश्चतैः पुन: । स्वस्तिवाचनकं कुर्यात्पिडानुद्धत्य भक्तितः ॥१७७॥ उच्छेषणं तु तत्तिष्टेद्यावह्विप्रविसर्जनम्। ततो गृहबलिं कुर्यादिति धर्मो व्यवस्थितः ॥१७८॥ उच्छेषणं भूमिगतमाजिहमस्याशठस्य च । दासवर्गस्य तत्पिडं भागधेयं प्रचक्षते॥१७९॥ पितृभिनिर्मितं पूर्वमेतदाप्यायनं सदा । अब्रतानामपुत्राणां स्त्रीणामपि नराधिप ॥१८०॥ ततः स्थानाग्रतः स्थित्वा प्रतिशृह्यांबुपात्रिकाम्। बाजेबाजेति च जपन्कुशाग्रेण विसर्जयेत् ॥१८ १॥ बहिः प्रदक्षिणं कुर्यात्पदान्यष्टावनुव्रजेत्। बंधुवर्गेण सहितः पुत्रभार्यासमन्वितः ॥१८२॥ निवृत्य प्रणिपत्याथ प्रयुज्याग्निं स मंत्रवित्। वैश्वदेवं प्रकुर्वीत नैत्यिकं बलिमेव च॥१८३॥ ततस्तुवैश्वदेवांते सभृत्यसुतबांधवः । भुंजीतातिथिसंयुक्तः सर्व॑ पितृनिषेवितम् ॥१८४॥ एतच्चानुपनीतोपि कुर्यात्सर्वेषु पर्वसु। श्राद्धं साधारणं नामसर्वकामफलप्रदम् ॥ भार्याविरहितोप्येतत्प्रवासस्थोपि भक्तिमान् ॥९८५॥ शुट्रोप्यमंत्रकं कुर्यादनेन विधिना नृप । तृतीयमाभ्युदयिकं वृद्धिश्राद्धं विधीयते ॥१८६॥ उत्सवानंदसंस्कारे यज्ञोद्वाहादिमंगले । मातरः प्रथमं पूज्याः पितरस्तदनंतरम् ॥१८७॥ ततो मातामहा राजन्विश्वेदवास्तथैव च । प्रदक्षिणोपचारेण दध्यक्षतफलोदकैः॥ ९ ८ ८॥ (मेरे पितृगण शान्त और मङ्गलमय हो) उस पर ब्राह्मण कहें सन्तु (ऐसा ही हो) ॥१७६।॥ इसके बाद यजमान ब्राह्मणों से प्रार्थना करे गोत्रं नो वर्द्धताम् (हमारा गोत्र बढता रहे) इस पर ब्राह्मण कहे तथास्तु ऐसा ही हो । उसके बाद यजमान कहे दातारो मेऽभिवर्धन्ताम् वेदाः सन्ततिरेव च । एताः सत्याः आशिषः सन्तु ।अर्थात् मेरे दाता बढ़ें, मेरे वंश में वेदाध्ययन चलता रहे, सुयोग्य सन्तान हो, ये सभी आशीर्वाद सत्य हों । ब्राह्मण कहें सन्तु सत्या आशिषः ये आशीर्वाद सत्य हों । उसके बाद पिण्डों को भक्ति पूर्वक उठाकर सूंधे और स्वस्ति वाचन करे ॥ १७७॥ जब तक ब्राह्मणों का विजर्सन नहीं हो जाता है तब तक उच्छेषण बना रहता है । उसके बाद अग्नि को प्रज्वलित करके बलिवैश्वदेव करे ॥१७८॥ पृथिवी पर गिरा हुआ तथा पिण्ड का जो अन्न होता है वह कपट रहित, सज्जन दासों का हिस्सा होता है ॥१७९॥ पितरों के द्वारा यह श्राद्ध पितरों को पुष्ट करने वाला है, इसे अनुपनीत (जिसका यज्ञोपवीत संस्कार नहीं हुआ है) पुत्र रहित तथा स्रिया भी कर सकती हैं ॥१८०॥ उसके बाद पितरों के समक्ष खड़ा होकर तथा जल पात्र को लेकर, बाजे बाजे० इत्यादि मन्त्र का उच्चारण करते हुए श्राद्धकर्ता कुश के अग्रभाग से पितरों का विसर्जन करे ॥१८१॥ उसके बाद ब्राह्मण की प्रदक्षिणा करे तथा जाते हुए ब्राह्मणों के पीछे आठ पग चले। इस काम को यजमान अपने बान्धवों, पुत्रों तथा पत्नी के साथ करे ॥१८२॥ उसके पश्चात् वह ब्राह्मणों को प्रणाम करके लौट जाय, फिर अग्नि को प्रज्वलित करके बलिवैश्वदेव तथा नित्यबलि की क्रिया को सम्पन्न करें॥१८३॥ उसके बाद वैश्वदेव कर्म करने के पश्चात् भृत्य, पुत्र, बन्धुवर्ग तथा अतिथि गण के साथ पितरों द्वारा सेवित अन्न का भोजन करे ॥१८४॥ इस श्राद्ध को अनुपनीत भी कर सकता है। इस श्राद्ध का नाम साधरण श्राद्ध है तथा यह कर्ता की सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है । इस श्राद्ध को विधुर तथा प्रवास में रहने वाले लोग भी भक्तिपूर्वक कर सकते हें ॥१८५॥ हे राजन् ! इस विधि से विना मंत्र के ही इस श्राद्ध को कर सकते हैं । तीसरे प्रकार का श्राद्ध आम्युदयिक श्राद्ध कहलाता है, इसे ही वृद्धि श्राद्ध भी कहते हैं ॥१८६॥ इस श्राद्ध को उत्सव के समय, आनन्दप्रद संस्कार के समय, यज्ञ के समय तथा विवाह आदि मङ्गलमय कार्य के समय किया जाता है । इस श्राद्ध में माताओं (माता, पितामही तथा प्रपितामही) की पूजा पहले की जाती है, उसके बाद पिता, पितामह तथा प्रपितामह की पूजा की

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know