Srishti Khanda Extracted Page 96
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-96
Sanskrit Original
संभूतिस्तस्य पुत्रोभून्त्रिधन्वा च ततोभवत्। त्रिधन्वनः सुतोजातस्तरय्यारूण इति स्मृतः ॥१४२॥ तस्य सत्यव्रतो नाम तस्मात्सत्यरथः स्मृतः । तस्य पुत्रोहरिश्चन्द्रो हरिश्चंद्राच्च रोहितः ॥१४३॥ रोहिताच्च वृको जातो वृकाद्वाहुरजायत । सगरस्तस्य पुत्रोभूद्राजा परमधार्मिकः ॥१४४॥ द्वेभायेसगरस्यापि प्रभा भानुमती तथा। ताभ्यामाराधितः पूर्वमौर्वाग्निः पुत्रकाम्यया ॥१४५॥ और्वस्तुष्टस्तयोः प्रादाद्यथेष्टं वरमुत्तमम् । एका षष्ठिसहस्त्राणि सुतमेकं तथा परा ॥१४६॥ अगृह्ृद्ंशकर्तरं प्रभाऽगृह्णाहृहून्सुतान् । एकं भानुमती पुत्रमगृह्णादसमंजसम्॥९४७॥ ततः षष्ठिसहर्त्राणि सुषुवे यादवी प्रभा । खनंतः पृथिवीं दग्धा विष्णुना येश्वमार्गणे ॥१४८॥ असमंजस्तु तनयो ह्यांशुमान्नामविश्रुतः। तस्य पुत्रो दिलीपस्तु दिलीपात्तु भगीरथः ॥१४९॥ येन भागीरथी गङ्गा तपःकृत्वाऽवतारिता। भगीरथस्य तनयो नाभाग इति विश्रुतः ॥१५०॥ नाभागस्यांबरीषोभूत्सिधुद्वीपस्ततोऽ भवत् । तस्यायुतायुः पुत्रोभूद्तुपर्णस्तोभवत् ॥१५ १॥ तस्य कल्माषपादस्तु सर्वकर्मा ततः स्मृतः । तस्यानरण्यः पुत्रोभून्निघ्नस्तस्य सुतोभवत् ॥१५ २॥ निघ्नपुत्रावुभौ जातावनमित्ररघूत्तमौ । अग्निमित्रोवनमगादरिनाशकृते नृप ॥१५३॥ रघोरभूद्दिलीपस्तु दिलीपाच्चाप्यजस्तथा । दीर्घबाहुरजाज्जातः प्रजापालस्ततोभवत्॥१५४॥ ततो दशरथो जातस्तस्य पुत्रचतुष्टयम् । नारायणात्मकाः सर्वेरामस्तस्याग्रजोभवत् ॥१५५॥ रावणांत करस्तद्दद्रधूणां वंशवर्द्वनः । वाल्मीकिर्यस्य चरितं चक्रे भार्गवसत्तमः ॥१५६॥ तस्य पुत्रः कुशो नाम इक्ष्वाकुकुलवर्द्धनः। अतिथिस्तु कुशाज्जातो निषधस्तस्य चात्मजः ॥१५७॥ तथा मुचुकुन्द, प्रतापी मुचकुन्द इन्द्र के मित्र के रूप में विख्यात हुए । पुरुकुत्स के पुत्र दुःसह हुए जो नर्मदा के पति थे ॥१४१॥ दुःसह के पुत्र त्रिधन्वा हुए । त्रिधन्वा के पुत्र त्रय्यारुणि हुए ॥१४२॥ त्रय्यारुणि के पुत्र सत्यव्रत हुए और उनके पुत्र सत्यरथ हुए । सत्यरथ के पुत्र हरिशचन्द्र हुए और हरिश्वन्द्र के पुत्र रोहित हुए ॥१४३॥ रोहित के पुत्र वृक हुए, वृक के पुत्र बाहु हुए, उनके पुत्र सगर हुए । वे परम धार्मिक राजा थे ॥१४४॥ सगर की दो पत्नियाँ थी प्रभा और भानुमती । उन दोनों ने पुत्र प्राप्ति की कामना से और्व महर्षि की आराधना की ॥१४५॥ प्रसन्न होकर और्व ने उन दोनों को यथेष्ठ वर प्रदान किया । एक को साठ हजार पुत्र प्रदान किया और एक को वंश बढ़ाने वाला एक पुत्र ॥१४६॥ प्रभा ने बहुत से पुत्रों को लिया और भानुमती ने वंश को बढाने वाले असमंजस नामक पुत्र को स्वीकारा ॥ १४७॥ उसके बाद यादववंश की पुत्री प्रभा ने साठ हजार पुत्रों को जन्म दिया जो अश्वमेध के घोड़े के मार्ग को खनते हुए भगवान् विष्णु के अंश कपिल महर्षि के द्वारा भस्म कर दिये गये ॥१४८॥ असमंजस के विख्यात पुत्र अंशुमान हुए । उनके पुत्र दिलीप हुए । दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए ॥१४९॥ उन्होंने तपस्या के द्वारा भागीरथी गङ्गा को पृथिवी पर अवतीर्ण किया । भगीरथ के पुत्र नाभाग हुए ॥१५०॥ नाभाग के पुत्र अम्बरीष हुए । अम्बरीष के पुत्र सिन्धद्वीप हुए । उनके पुत्र अयुतायु हुए । आयुतायु के पुत्र ऋतुपर्ण हुए ॥१५१॥ ऋतुपर्ण के पुत्र कल्माषपाद हुए । उनके पुत्र सर्वकर्मा हुए । सर्वकर्मा के पुत्र अनरण्य हुए, उनके पुत्र निघ्न हुए ॥१५२॥ निघ्न के दो पुत्र हुए, अनमित्र तथा रघु । शत्रु का नाश हो जाने पर अनमित्र वन में चले गये ॥१५३॥ रघु के पुत्र दिलीप हुए और दिलीप के पुत्र अज हुए । अज के पुत्र दीर्घबाहु हुए उनके पुत्र प्रजापाल हुए ॥१५४॥ प्रजापाल के पुत्र दशरथ हुए । उनके चार पुत्र हुए । वे सबके सब नारायण स्वरूप थे । उनमें राम सबसे बड़े थे ॥१५५॥ राम ने रावण का विनाश किया । वे रघुवंशियों के वंश को बढाने वाले थे । भार्गवश्रेष्ठ वाल्मीक ने उनके चरित का वर्णन
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