Srishti Khanda Extracted Page 92
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-92
Sanskrit Original
उवाच स तदा देवं पद्याक्ष पद्मजं विभुम्। वशे मे धर्मसंयुक्ताः पृथिव्या सर्वपार्थिवाः ॥८ ०॥ भवेयुरीश्वराः स्वामिन्प्रसादात्तव कंजज । तथेत्युक्तवा तु देवेशस्तत्रैवांतरधीयत ॥८ १॥ ततोऽ योध्यां समागत्य समतिष्ठद्य॒था पुरा । अथैकदा रथारूढ इलो निजसुतो मनोः ॥८२॥ निर्जगामार्थसिध्यर्थमिनप्रायां महीमिमाम् । भ्रमन् द्वीपानि सर्वाणि क्ष्माभूतः संप्रसाधयन् ॥८ ३॥ जगामोपवनं शंभोरथाकृष्टः प्रतापवान् । कल्पद्ुमलताकीर्णं नाप्रा शरवणं महत् ॥८४॥ रमते यत्र देवेशः सोमः सोमार्द्शेखरः। उमया समयस्तत्र पुरा शरवणे कृतः ॥८५॥ पुंनामसंज्ञं यत्किचिदागमिष्यति नो वनं। स्त्रीत्वमेष्यति तत्सर्वं दशयोजनमंडले ॥८६॥ अज्ञातसमयो राजा इलः शरवणं गतः। स्त्रीत्वं जगाम सहसा बडवाश्वोऽ भवत्क्षणात् ॥८७॥ पुरुषत्वे कृतं सर्व॑ स्न्रीकाये विस्मृतं ततः । इलेति साऽभवन्नारी पीनोन्नतघनस्तनी ॥८८॥ उन्नतश्रोणिजघना पद्मपत्रायतेक्षणा । पूर्णेन्दुवदना तन्वी विलासिन्यसितेक्षणा ॥८९॥ पीनोन्नतायतभुजा नीलकुंचितमुर्दजा । तनुलोमा सुवदना मृदुगत्दभाषिणी ॥९०॥ श्यामा गौरेण वर्णेन तनुताप्रनखांकुरा। कार्मुक भ्रूयुगोपेता हंसावरणगामिनी॥९ ९॥ भ्रममाणा वने तस्मिन् चिंतयामास भामिनी। को मे पिता वा भ्राता वा को मे त्राता भवेदिह॥९२॥ कस्य भर्तुरहं दत्ता कियद्वर्षास्मि भूतले। चितयन्ती च ददृशे सोमपुत्रेण साङ्गना ॥९३॥ इलारूपसमाक्षिप्तमनसा वरवर्णिनी । बुधस्तदाप्तये यत्नमकरोत्कामपीडितः ॥९४॥ हे मानवेय ? अपने मनोऽ5नुकूल वरदान माँगो ॥७९॥ उसके बाद मनु ने कमल के समान नेत्र वाले ब्रह्माजी से कहा-- पृथिवी के सभी धार्मिक राजा मेरे वंश में हो जायँ ॥८०॥ हे ब्रह्माजी ! आपकी कृपा से सभी राजा मेरे अधीन हो जायँ । ब्रह्माजी भी तथास्तु कहकर वहीं अन्तर्धान हो गये ॥८१॥ इसके बाद मनु अयोध्या में आकर पहले के ही समान रहने लगे । एक दिन रथ पर सवार होकर मनु का इल नामक पुत्र ॥८ २॥ अपने अर्थ की सिद्धि के लिए पृथिवी पर चल पड़े । वे राजाओं को अपने वशवर्ती बनाते हुए सभी द्वीपों में घूमते हुए ॥८३॥ कल्प वृक्ष से परिपूर्ण भगवान् शङ्कर के महान् शरवण नामक वन को देखकर उसमें चले गये । उस वन में जिनके शिर पर अर्द चन्द्रमा हैं ऐसे भगवान् शङ्कर पार्वतीजी के साथ क्रीडा करते हैं । उस वन में पूर्वकाल में शङ्करजी ने पार्वतीजी से कहा था कि इस वन के दश योजन के भीतर यदि कोई भी पुरुष संज्ञक जीव आ जायेगा तो वह स्री हो जायेगा ॥८५-८६॥ इस बात को राजा इल नहीं जानते थे अतएव वे शरवण वन में चले गये । वे एकाएक स्री हो गये और उनका घोड़ा भी घोड़ी हो गया ॥८७॥ वे पुरुष रहने के समय की सारी बातों को स्री होते ही भूल गये । वह पुष्ट तथा उन्नत स्तनों वाली इला नाम की नारी हो गये ॥८८॥ उसके श्रोणी तथा जङ्घे उठे हुए, कमल दल के समान विस्तृत नेत्र, पूर्ण चन्द्रमा के समान आह्लादक गुखमण्डल, दुबले पतले शरीर वाली तथा काले नेत्रों वाली विलासिनी (सुन्दरी) हो गये ॥८९॥ उसकी मांसल तथा लम्बी भुजायें तथा कालें घुंघराले केश हो गये । कम रोओं तथा सुन्दर मुख वाली, गद्गद वाणी में बोलने वाली हो गयी वह ॥९०॥ गोरे वर्ण की उस युवती के लाल-लाल पैरों के नख हो गये । उसकी घनुष के समान भ्रुकुटी थी वह हंस के समान चलती थी ॥९१॥ उस वन में घूमती हुयी वह भुन्दरी सोचने लगी कि मेरे पिता अथवा भाई कौन है ? मेरा यहाँ रक्षक कौन है ?॥९२॥ मेरे पति कौन हैं ? मेरी अवस्था कितने वर्ष की है ? इसतरह से चिन्तन करती हुयी उसको सोम के पुत्र बुध ने देखा ॥९३॥ वे इला के आकर्षक रूप को देखकर उस पर आकृष्ट हो गये । वे कामार्त होकर उसे प्राप्त करने का प्रयास करने लगे ॥९४॥
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