Srishti Khanda Extracted Page 85

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-85

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Sanskrit Original

प श्रीपद्ममहापुराण तथैव जन्यधामानौ मुनयःसप्तनामतः। साध्या देवगणा ये च कौर्तिस्तामसेंतरे ॥९५॥ अकल्मषस्तपोधन्वी तपोमूलस्तपोधनः । तपोराशिस्तपस्यश्च सुतपस्यः परंतपः॥९६॥ तामसस्य सुताः सर्वे दश वंशविवर्धनाः । पंचमस्य मनोस्तद्वद्रैवतस्यांतरं श्रृणु ॥९७॥ देवबाहुः सुबाहुश्च पर्ज्यन्यः सोमपो मुनिः । हिरण्यरोमा सप्ताश्वः सप्तैतेऋषय: स्मृताः ॥९८॥ देवाश्चभूतरजसस्तथा प्रकृतयः स्मृताः । अवशस्तत्वदर्शी च वीतिमान्हव्यपः कपिः ॥९९॥ मुक्तोनिरुत्सुकः सत्वो निर्मोहोऽ थ प्रकाशकः। धर्मवीर्यबलोपेतो दशैते रेवतात्मजाः ॥९००॥ भृगुः सुधामा विरजः सहिष्णुर्नारदस्तथा । विवस्वान्कृतिनामा च सप्त सप्तर्षयोपरे॥१०१॥ चाक्षुषस्यांतरे देवालेखानामपरिश्रुताः । विभवोऽ थपृथक्चानुकीर्तितास्त्रिदिवौकसः ॥१०२॥ चाक्षुषस्यांतरे प्राप्ते देवानां पंचमो जनः। रुरुप्रभृतयस्तद्वच्चाक्षुषस्य सुता दश ॥१०३॥ प्रोक्ताः स्वायंभुवे वंशे ये मयापूर्वमेव ते। अन्तरंचाक्षुषं चैव मया ते परिकीर्तितम्॥१०४॥ सप्तमं च प्रवक्ष्यामि यद्वैवस्वतमुच्यते । अत्रिश्चैव वसिष्ठश्च कश्यपो गौतमस्तथा ॥९०५॥ भारद्वाजस्तथा योगी विश्वामित्रः प्रतापवान्। जमदग्निश्च सप्तैते सांप्रतं ते महर्षयः॥१०६॥ कृत्वा धर्मव्यवस्थानं प्रयान्ति परमं पदम् । सावर्ण्यस्य प्रवक्ष्यामि मनोर्भावि तथांतरम् ॥१०७॥ अश्वत्थामा शरद्वांश्च कौशिको गालवस्तथा। शतानंदः काश्यपश्च रामश्च ऋषयस्मृताः ॥९०८॥ धृतिर्वरीयान्यवसुः सुवर्णो धृतिरेव च। वरिष्णुवीर्यः सुमतिर्वसुश्शुक्रश्च वीर्यवान् ॥१०९॥ भ्रविष्यस्यार्क सावर्णेर्मनोः पुत्राः प्रकीर्तिताः । रौच्यादयस्तथान्येपि मनवः संप्रकर्तिताः ॥११०॥ रुचेः प्रजापतेः पुत्रौ रौच्यो नाम भविष्यति। मनुर्भूतिसुतस्द्वद्धौत्यो नाम भविष्यति ॥१११॥ कवि, पृथु, अग्नि, अकपि, कपि, जन्य तथा धामा । तामस मन्वन्तर में साध्य गण नामक देवता थे ॥९४-९५॥ तामस के वंश को बढाने वाले उनके दश पुत्र हुए अकल्मष, तपोधन्वा, तपोमूल, तपोधन, तपोराशि, तपस्य, सुतपस्य, परन्तप, तपोभागी और तपोयोगी । अब तुम पाञ्चवें रैवत मन्वन्तर को सुनो ॥९६-९७॥ इस मन्वन्तर के सप्र्षियों के नाम हैं, देवबाहु, सुबाहु, पर्जन्य, सोमप मुनि, हिरण्यरोमा तथा सप्ताश्च ॥९८॥ इस मन्वन्तर के देवता भूत रजस तथा प्रकृत नाम वाले थे । रेवत मनु के दश पुत्र थे वरुण, तत्त्वदर्शी, चितिमान, हव्यप, कवि, मुक्त, निरुक्त, सत्व, विमोह एवं प्रकाशक । ये सभी धर्म, पराक्रम और बल से युक्त थे ॥९९-१००॥ उसके पश्चात् चाक्षुष मन्वन्तर में भृगु, सुधामा, विरज, सहिष्णु, नारद, विवस्वान तथा कृति ये सात सप्तर्षि हुए ।।१०१॥ इस मन्वन्तर में लेखा नामक देवता प्रख्यात हुए । इन सबों से अहितिवत्त ऋभु, पृथाग्भूत, वारिमूल तथा दिवौका नामक देवता थे। चाक्षुष् मन्वन्तर में ये देवताओं की पाँच योनियाँ थी । उसी तरह इस मनु के रुरु इत्यादि दश पुत्र हुए ॥१०३॥ जिन सबों का वर्णन मैं स्वायम्भुव वंश के वर्णन में कर चुका हूँ । इस तरह से मैंने चाक्षुष मन्वन्तर का वर्णन किया।।१०४॥। अब मैं सातवें वैवस्वत मन्वन्तर का वर्णन करूँगा । इस मन्वन्तर के सप्तर्षि हें आत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम, भारद्वाज, प्रतापीयोगी विश्वामित्र तथा जमदग्नि । ये ही इस समय सप्तर्षि हैं ॥१०५-१०६॥ ये सभी धर्म की व्यवस्था करके परम पद चले जाते हैं । अब मैं भविष्यत् कालिक सावर्णि मनु के मन्वन्तर का वर्णन करूँगा।। १ ० ७॥ इस मन्वन्तर के सप्तर्षि अश्वत्थामा, शरद्वान्, कौशिक, गालव, शतानन्द, काश्यप तथा राम (परशुराम) कहे गये हैं ॥१०८॥ धृति, वरीयान, यवसु, सुवर्ण, धृष्टि, चरिष्णु, आद्य, सुमति, वसु तथा पराक्रमी शुक्र ॥१०९॥ ये भविष्यत् कालिक सावर्णि मनु के पुत्र बतलाये गये हैं । इन से भिन्न रौच्य आदि मनुओं के नाम

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