Srishti Khanda Extracted Page 72

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-72

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Sanskrit Original

एवमुक्तो भगवता प्रणम्याथ सुरेश्वरम्। जगाम स्वनिकेतं तु गणानामेव पश्यताम् ॥९०॥ पत्न्याः शोकेन वै देवो गंगाद्वारे तदास्थितः। तां सती चितयानस्तु क्वनु सामे प्रिया गता ॥९१॥ तस्य शोकाभिभूतस्य नारदो भवसंन्निधौ। सा ते सती या देवेश भार्याप्राणसमा मृता ॥९ २॥ हिमवहहिता सा च मेनागर्भसमुद्धवा । जग्राह देहमन्यं सा वेदवेदार्थवेदिनी॥९३॥ श्रुत्वा देवस्तदाध्यानमवतीर्णामपश्यत । कृतकृत्यमथात्मानं कृत्वा देवस्तदास्थितः ॥९४॥ संप्राप्तयौवना देवी पुनरेव विवाहिता । एवं हि कथितं भीष्म यथायज्ञो हतः पुरा॥९५॥ इतिश्रीपदामहापुरणे प्रथमे सष्टिखण्डे दक्षयज्ञविध्वंसो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥ - Ne छठा अध्याय भीष्म उवाच देवानां दानवानां च गंधर्वोरगरक्षसाम् । उत्पत्तिं विस्तरेण मां गुरो ब्रूहि यथाविधि ॥९॥ पुलस्त्य उवाच संकल्पाहरर्शनात्स्पर्शात्पूर्वेषां सृष्टिरुच्यते । दक्षात्प्राचेतसादूर्ध्व सृष्टिमैथुनसंभवा ॥२॥ सभी कामनाओं की सिद्धि के लिए आप सर्वोत्तम फल प्राप्त करेंगे ॥८९॥ इस तरह से भगवान् शङ्कर के कहने पर उनको प्रणाम करके दक्ष प्रजापति गणों के सामने ही आपने निवास स्थान पर चले गये ॥९०॥ पत्नी के शोक से संतप्त भगवान् शिव गङ्गाद्वार में ही रहकर उन सती के विषय में सोचते रहते थे कि मेरी प्रिया कहाँ चली गयी॥९ १॥ शोक सन्तप्त शङ्करजी के पास आकर नारदजी ने बतलाया कि हे देवेश ! आपकी प्राणप्रिया पत्नी सती जो मर गयीं ॥९२॥ वह हिमवान की पत्नी मेनका के गर्भ से उत्पन्न हुयी हैं । वेदों तथा वेदार्थो को जानने वाली उसने दूसरा शरीर धारण कर लिया है ।॥९३॥ यह सुनकर भगवान् शङ्कर ने ध्यान करके देखा कि वह अवतीर्ण हो गयी हैं । उसके बाद अपने को कृतकृत्य मानकर वे निश्चिन्त हो गये ॥९४।। जब वे देवी युवावस्था वाली हुयीं तो भगवान् शङ्कर ने उनसे विवाह किया । हे भीष्म | इस तरह से मैंने आपको यज्ञ विध्वंस के प्रकार को सुनाया॥९५॥ इस तरह पद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के दक्षयज्ञ विध्वंस नामक पाँचवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ५।। ae -_. दक्ष से पहले सङ्कल्पजन्य, दर्शनजन्य तथा स्पर्शजन्य सृष्टि का वर्णन, दक्ष के पश्चात् मैथुनी सृष्टि का वर्णन, हर्यश्वों तथा शबलाश्वों को नारदजी के उपदेश से मोक्षमार्ग का अनुसरण, विश्वेदेव, वसुगण, रुद्र तथा आदित्यों की उत्पत्ति, दैत्यों की उत्पत्ति के प्रसङ्ग में बाणासुर का संक्षिप्त चरित्र, दानवों, गरुड तथा शुक आदि की उत्पत्ति का वर्णन भीष्मजी ने कहा-- हे गुरो | आप मुझे देवों, दानवों, गन्धर्वो! उरगों तथा राक्षसों की उत्पत्ति को विस्तार पूर्वक सुनाइये ।।१॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- दक्ष से पहले देखने मात्र से, सङ्कल्प मात्र से तथा स्पर्श करने से ही सृष्टि होती थी । दक्ष के बाद मैथुन से सृष्टि होने लगी ॥२॥ हे कुरुवंशावर्तस ! ब्रह्माजी ने जैसे सृष्टि की उसे तुम

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