Srishti Khanda Extracted Page 65
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-65
Sanskrit Original
सर्वात्मकोसि सर्वेश सर्वभूतस्थितो यतः । कथयामि ततः किं ते सर्ववेत्सि हृदि स्थितम् ॥९२७॥ यो मे मनोरथो देव सफलः स त्वया कृतः । तप्तं सुतप्तं सफलं यददृष्टोसि जगत्पते ॥९२८॥ ब्रह्मोवाच तपसस्तत्फलं पुत्र यददृष्टोहं त्वयाधुना । महुर्शनं हि विफलं नारदेह न जायते ॥१२९॥ वरं वरय तस्मात्त्वं यथाभिमतमात्मनः । सर्वसंपद्यते तात मयि दृष्टिपथं गते ॥१३०॥ नारद उवाच भगवन्सर्वभूतेश सर्वस्यास्ते भवान् हृदि। किमज्ञातं तव स्वामिन्मनसा यन्मयेप्सितम् ॥१३१॥ कृता त्वया यथा सूष्टिर्मया दृष्टा तथाविभो । तेन मे कौतुकं जातं दृष्ट्वा देवर्षिदानवान् ॥१३२॥ पुलस्त्य उवाच नारदस्य पिता तुष्टो ब्रह्मा देवो दिवस्पतिः । नारदाय वरं प्रादादृषीणामुत्तमो भवान्॥१३३॥ भविता मत्प्रसादेन कलिकेलिकथाप्रियः । गतिश्च तेऽप्रतिहता दिवि भूमौ रसातले ॥१३४॥ यज्ञोपवीतसूत्रेण योगपट्टावलंबिका । छत्रिका च तथा बीणा अलंकाराय ते नघ॥१३५॥ विष्णोः समीपे रुद्रस्य तथाशक्रस्य नारद। द्वीपेषु पार्थिवानांतु सदा प्रीतिं च लाप्स्यसे॥१३६॥ वर्णानां तु भवान् शास्ता वरो दत्तो मया तव । तिष्ठ पुत्र यथाकामं सेव्यमानः सुरैर्हिवि ॥१३७॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखण्डे लक्ष्म्युत्पत्तिर्नामचतुर्थो$ध्याय: ॥४॥ —— te हें ॥१२५॥ सर्वस्वरूपधारी आप ही सबों में सब कुछ हैं । आप से ही सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न है; अतएव सर्वात्मा रूप आपको नमस्कार है ॥१२६॥ आप चूँकि सभी भूतों में स्थित हैं, अतएव आप सर्वात्मक हैं । अतएव मैं आपसे क्या कहुँ? आप हृदय की सारी बातों को जानते हैं ॥१२७॥ हे देव ! मेरा जो मनोरथ है, उसे आपने सफल बना दिया । हे जगत् के स्वामिन् ! मेरी छोटी बड़ी सभी तपस्याएँ सफल हो गयीं; क्योंकि मुझे आपका दर्शन मिल गया ॥१२८॥ ब्रह्माजी ने कहा- हे पुत्र ! मेरा दर्शन ही तपस्या का फल है । हे नारद ! इस लोक में मेरा दर्शन विफल नहीं होता है ॥१२९॥ अतएव तुम अपने अभिमत वरदान को माँग लो । हे तात ! मेरा दर्शन मिल जाने पर उपासक को सब कुछ प्राप्त हो जाता है ॥१३०॥ नारदजी ने कहा-- हे सभी जीवों के स्वामी भगवन् ! आप सबों के हृदय में स्थित है; अतएव हे स्वामिन् ! जो मेरे मन में है, वह आपको आज्ञात है क्या ?॥१३१॥ हे विभो ! आपने जैसे सृष्टि की उसे मैंने देखा है, अतएव देवताओं, ऋषियों तथा दानवों को देखकर मेरे मन में कौतूहल हो गया ॥१३ २॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा--- द्युलोक के स्वामी तथा नारदजी के पिता ब्रह्माजी प्रसन्न हो गये और उन्होंने उन्हें वरदान दिया कि तुम ऋषियों में श्रेष्ठ हो जाओ ॥१३३॥ मेरी कृपा से कलि के केलि से जन्य चर्चा में तथा भगवत् कथा में तुम्हारी रुचि होगी । तुम्हारी चुलोक, भूलोक तथा पाताललोक में अव्याहत रूप से गति होगी ॥१३४॥ यज्ञोपवीत सूत्र से तुम्हारा योग पट्ट लगा रहेगा, छाता तथा वीणा ये दोनों तुम्हारे अलङ्कार होंगे ॥१३५॥ हे नारद ! भगवान् विष्णु, शङ्कर तथा इन्द्र एवं द्वीपो के राजाओ का तुमसे सदा प्रेम होगा ॥१३६॥ तुम सदा वर्णों का प्रशंसक होंगे यह वरदान मैने तुम्हें प्रदान किया । हे पुत्र ! अपनी इच्छा के अनुसार देवताओं द्वारा सेवित होकर तुम द्युलोक में निवास करो ॥१३७॥इस तरह से श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के लक्ष्मी की उत्पत्ति नामक चतुर्थ अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ४।। —— Se
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