Srishti Khanda Extracted Page 63
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-63
Sanskrit Original
ततः कोपसमाविष्टो भृगुरप्याह केशवम्। पक्षपातेन मां साधो भार्याया बाधसेघुना ॥९७॥ नृलोके दश जन्मानि लप्स्यसे मधुसूदन । भार्यायास्ते वियोगेन दुःखान्यनुभविष्यसि ॥९८॥ एवं शापं ददौ तस्मै भृगुःपरमकोपनः । विष्णुना च पुनस्तस्य दत्तःशापो महात्मना ॥९९॥ नचापत्यकृतां प्रीतिं प्राप्स्यसे मुनिपुंगव। शापं दत्त्वा ऋषेस्तस्य ब्रह्मलोकं जगाम ह ॥१००॥ पद्जन्मानमाहेदं दृष्टवास्तुदेवस्केशवः । भगवंस्तव पुत्रोऽसौ भृगुःपरमकोपनः ॥९०९॥ निष्कारणं च तेनाहं शप्तो जन्मानि मानुषे। लप्स्यसे दशधा त्वं हि ततो दुः खान्येकशः ॥१०२॥ भार्यावियोगजा पीडा बलपौरुषनाशिनी । त्यक्त्वा चाहमिमं लोकं शयिष्ये च महोदधौ ॥१०३॥ देवकार्येषु सर्वेषु पुनश्चावाहनं क्रिया: । तथा ब्रुवंतं तंदेवं ब्रह्मा लोकगुरुस्तदा ॥१०४॥ प्रसादनार्थं विष्णोस्तु स्तुतिमेतां चकार ह। त्वया सृष्टं जगदिदं पद्मं नाभौ विनिःसृतम् ॥ तत्र चाहं समुत्पन्नस्तव वश्यश्च केशव ॥१०५॥ त्वं त्राता सर्वलोकानां स्त्रष्टा त्वं जगतः प्रभो। त्रैलोक्यं न त्वया त्याज्यमेष एव वरो मम ॥९०६॥ दश जन्म मनुष्येषु लोकानां हितकाम्यया। स्वयं कर्त्ता न ते शक्तः शापदानाय कोपि वा ॥१०७॥ को यं भृगुः कथं तेन शक्यं शप्तुं जनार्दन। मानयस्व सदा विप्रान् ब्राह्मणास्ते तनुस्स्वयम् ॥९०८॥ योगनिद्रामुपास्व त्वं क्षीराब्धौ स्वपिहीश्वर । कार्यकाले पुनस्त्वां तु बोधयिष्यामि माधव॥९०९॥ भगवन्नेष तावत्तु त्वच्छक्त्या चोपबृंहितः । सर्वकार्यकरः शक्रस्तवैवांशेन शत्रुहा ॥१९०॥ त्रैलोक्यं पालयन्नेव त्वदाज्ञा स करिष्यति। एवं स्तुतस्दा विष्णुर्ब्रह्माणमिदमुक्तवान् ॥९९९॥ सर्वमेतत्करिष्यामि यन्मां ज्ञापयसे प्रभो । अदर्शनं गतो देवो ब्रह्मा तं नाभिजज्ञिवान्॥९९२॥ नगर को दे ही देना चाहिए ॥९६॥ उसके कारण क्रुद्ध होकर भगवान् विष्णु को भृगु महर्षि ने कहा-- तुम अपनी पत्नी का पक्षपात करके मुझे बाध्य कर रहे हो ॥९७॥ हे मधुसूदन ! तुम मनुष्य लोक में दश जन्मों को धारण करोगे । पत्नी का वियोग होने से तुम्हें बहुत अधिक कष्ट उठाना पड़ेगा ॥९८॥ अत्यन्त क्रोधी भृगु महर्षि ने श्रीभगवान् को इस प्रकार से शाप दे दिया । भगवान् विष्णु ने भी भृगु महर्षि को शाप दे दिया ॥९९॥ हे मुनि श्रेष्ठ! आपको भी सन्तान सुख नहीं मिलेगा । ऋषि को शाप देकर भगवान् ब्रह्मलोक में गये ॥१००॥ ब्रह्माजी से मिलकर भगवान् केशव ने कहा-- भगवन् ! आपके पुत्र भृगु अत्यन्त क्रोधी हैं ॥१०१॥ बिना किसी कारण के उन्होने मुझे मनुष्य जन्म लेने का शाप दे दिया है । उन्होंने कहा कि तुम दश बार मनुष्य का जन्म लोगे और वहाँ तुम्हें अनेक प्रकार से दुःख प्राप्त होगा ॥१०२॥ पत्नी के वियोग से होने वाला कष्ट बल तथा पौरुष का नाश करने वाला होता है । में इस लोक का परित्याग करके महासागर में शयन करूँगा ॥१०३॥ आप देवताओं आदि के कार्यो में मेरा पुनः आवाहन करेंगे । इसतरह कहने वाले भगवान् केशव से लोकगुरु ब्रह्माजी ने कहा ॥१०४॥ उन्होंने भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने के लिए इस प्रकार से स्तुति की । आपने ही जगत् की सृष्टि की थी । आपकी नाभि में कमल उत्पन्न हुआ । हे केशव ! उसी कमल पर आपके वशीभूत मेरा जन्म हुआ ॥१०५॥ हे प्रभो ! आप ही जगत् की सृष्टि करने वाले तथा रक्षा करने वाले हैं । आप त्रैलोक्य का परित्याग न करें, मैं आपको वरदान देता हूँ ॥१०६॥ आप अपनी इच्छा से ही मनुष्य लोक में जगत् का कल्याण करने की इच्छा से दश बार जन्म लेंगे । आप को कोई भी शाप नहीं दे सकता है ॥१०७॥ हे जनार्दन ! ये भृगु कौन शाप देने वाले होते हैं ? ब्राह्मण आपके शरीर हैं आप ब्राह्मणों का सम्मान करते हैं ॥१०८॥ आप योगनिद्रा का आश्रय लेकर क्षीर सागर में शयन करें । हे माधव ! आवश्यकता पड़ने पर मैं आपको जगाऊंगा ॥१०९॥ हे भगवन् ! आपकी ही शक्ति से पुष्ट होकर, आपके अंशभूत, शत्रुओं का विनाश करने वाले इन्द्र सभी कार्यों को करेंगे ।।११०॥ त्रैलोक्य का पालन करते हुए इन्द्र आपकी आज्ञा का पालन करेंगे इस तरह से स्तुति किये जाने पर भगवान् विष्णु ने ब्रह्माजी से कहा ॥१११॥ हे प्रभो! आप जो
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