Srishti Khanda Extracted Page 45

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-45

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Sanskrit Original

द्यावापृथिव्योरतुलप्रभाव यदंतरं तद्दपुषा तवैव । व्याप्तं जगद्दयापि समस्तमेतद्धिताय विश्वस्य विभो भव त्वम् ॥४७॥ परमात्मा त्वमेवैको नान्योस्ति जगतः पते | ॥४८॥ | तवैष महिमा येन व्याप्तमेतच्चराचरम्। ज्ञानस्वरूपमखलं जगदेतदबुद्धयः ॥४९॥ अर्थस्वरूपं पश्यंतो भ्राम्यते तमसः प्लवे। ये तु ज्ञानविदश्शुद्धचेतसस्तेऽखिलं जगत् ॥५०॥ ज्ञानात्मकं प्रपश्यति त्वद्रूपं परमेश्वर । प्रसीद सर्वभूतात्मन् भवाय जगतस्त्विमाम् ॥५१॥ उद्धरोर्वीममेयात्मन्निमग्रामग्जलोचन । सत्वोद्रिक्तोसि भगवन्गोविंद् पृथिवीमिमाम्॥५ २॥ समुद्धर भवायेश कुरु सर्वजगद्धिम्। एवं संस्तूयमानश्च परमात्मा महीधरः ॥५३॥ उज्जहार क्षितिं क्षिप्रं न्यस्तवान्स महार्णवे। तस्योपरि जलौघस्य महती नौरिवस्थिता ॥५४॥ ततःक्षितिं समां कृत्वा प्रथिव्यामचिनोत्निरीन् । यथाविभागं भगवाननादिः पुरुषोत्तमः ॥ ५ ५॥ भूविभागं ततःकृत्वा सप्तद्वीपान्यथातथम् । भूराद्यांश्चतुरो लोकाम्पूर्ववत्समकल्पयत् ॥५६॥ ब्रह्मणे विष्णुना पूर्वमेतदेव प्रदर्शितम् । तुष्टेन देवदेवेन त्वं देवः पुरुषोत्तमः ॥५७॥ त्वया मया जगच्चेदं धार्यं पाल्यं च यत्मतः। येषां त्वसुरमुख्यानां वरो दत्तो मयाधुना ॥५८॥ देवानां हितकामेन हंतव्यास्ते त्वया विभो। अहं सृष्टिं करिष्यामि सा च पाल्या त्वया विभो॥५९॥ एवमुक्तो गतो विष्णुर्देवादीनसृजद्विभुः । अबुद्धिपूर्वकस्तस्य प्रादुर्भूतस्तमोमयः ॥६ ०॥ निवास है । आपकी जिह्वा की अग्नि है और आपके रोम ही कुश हैं और आप ही यज्ञ पुरुष हैं ॥४६॥ हे अतुलनीय प्रभाव सम्पन्न प्रभो ! द्युलोक और भूलोक के बीच में जो अन्तराल है, वह आपके ही शरीर से व्याप्त है हे विभो! आप इस जगत् का कल्याण करें ॥४७॥ हे संसार के स्वामिन् ! केवल आप ही परमात्मा हैं ॥४८॥ आपकी महिमा से यह चराचर जगत् व्याप्त है । यद्यपि यह सम्पूर्ण जगत् ज्ञान स्वरूप है किन्तु अज्ञानी जीव इसे विषय रूप से देखते हैं ॥४९॥ ऐसा अनुभव करने के कारण वे अज्ञान सागर में चक्कर काट रहे हैं । जो लोग ज्ञान स्वरूप परमात्म तत्त्व के ज्ञाता हैं तथा शुद्र अन्तःकरण वाले हैं वे लोग आपके शरीरभूत सम्पूर्ण जगत् का ॥५०॥ ज्ञानात्मक रूप से अनुभव करते हैं । हे भूतात्मन् ! आप जगत् का कल्याण करने के लिए प्रसन्न हो जाइये और हे अमेयात्मन् कमलनयन ! इस डुबी हुयी पृथिवी का आप उद्धार करें । हे गोविन्द ! आप में सत्त्व गुण उद्रिक्त हो गया है, अतएव जगत् का कल्याण करने के लिए आप पृथिवी का उद्धार करें । इसतरह से मुनियों द्वारा स्तुति किये जाते हुए पृथिवी को धारण किए परमात्मा ॥५१-५२॥ शीघ्र ही पृथिवी का उद्धार करके उसको महार्णव के ऊपर स्थापित कर दिये और वह (पृथिवी) जल समूह के ऊपर विशाल नौका के समान स्थित हो गयी ॥५४॥ इसके बाद पृथिवी को समतल बनाकर ब्रह्माजी ने उसके ऊपर पर्वतों को व्यवस्थित किया । विभागों के अनुसार अनादि भगवान् पुरुषोत्तम ने ॥५५॥ यथोचित रूप से पृथिवी का विभाग करके सात द्वीपों तथा भूलोक आदि चारो लोकों की पूर्वमन्वन्तर के ही समान रचना की ॥५६॥ भगवान् विष्णु ने ब्रह्माजी को इतने ही मात्र को बतलाया । उससे प्रसन्न होकर देवदेव ब्रह्माजी ने कहा-- आप ही पुरुषोत्तम हैं ॥५७॥ यह जगत् आपका और मेरा (दोनों का) धार्य और पाल्य है । जिन बड़े-बड़े असुरों को मैंने वरदान दिया है ॥५८॥ हे विभो ! देवताओं का कल्याण करने के लिए आप उन सबों का वध कर दें । हे विभो ! मैं जगत् की सृष्टि करूंगा और आप उसका पालन करेंगे ॥५९॥ इसतरह से कहे जाने पर भगवान् विष्णु चले गये और ब्रह्माजी ने देवताओं आदि की सृष्टि की । बुद्धिपूर्वक उस सृष्टि

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