Srishti Khanda Extracted Page 41
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-41
Sanskrit Original
तीसरा अध्याय भीष्म उवाच निर्गुणस्याप्रमेयस्य शुद्धस्याथमहात्मनः । कथं सर्गादिकर्त्ृत्वं ब्रह्मणो ह्युपपद्यते ॥१॥ पुलस्त्यउवाच शक्तयः सर्वभावानामचित्यज्ञानगोचराः । यत्ततो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः ॥२॥ उत्पन्नः प्रोच्यतो विद्वन्नित्य एवोपचारतः । निजेन तस्य मानेन आयुवर्षशतं स्मृतम् ॥३॥ तत्पराख्यं परार्द्धं च तदर्द्धं परिकीर्तितम् । काष्ठापंचदशाख्याता निमेषो नृपसत्तम ॥४॥ काष्ठाखिशत्कलात्रिंशत्कलामौहूर्तिको विधिः । तावत्संख्यैरहोरात्रं मुहूर्तैर्मानुषं स्मृतम् ॥५॥ अहोरात्राणि तावंति मासः पक्षद्वयात्मकः । तैष्षड्भिरयनं वर्षमयने दक्षिणोत्तरे ॥६॥ अयनं दक्षिणं रात्रिरदेवानामुत्तरं दिनम्। दिव्यैर्वर्षसहस्रैस्तु कृतत्रेतादिसंज्ञितम् ॥७॥ चतुर्युगं द्वादशभिस्तद्विभागं निबोध मे। चत्वारि त्रीणि द्वे चैकं कृतादिषु यथाक्रमम् ॥८॥ दिव्याब्दानां सहस्त्राणि युगेष्वाहुः पुराविदः । तत्प्रमाणैः शतैःसंध्या पूर्वा तत्राभिधीयते ॥९॥ संध्यांशकश्च तत्तुल्यो युगस्यानंतो हि यः ।संध्यासंध्यांशयोरंतः कालो यो तृपसत्तम ॥१०॥ ब्रह्माजी की आयु, युगादि काल का वर्णन, पृथिवी का उद्धार तथा ब्रह्माजी द्वारा की गयी अनेक प्रकार की सृष्टियों का वर्णन भीष्मजी ने कहा- निर्गुण, अप्रमेय तथा शुद्ध महात्मा ब्रह्माजी किस प्रकार सृष्टि करने का कार्य करते हैं?॥। १॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- सभी पदार्थो में रहने वाली शक्तियाँ अचिन्त्य ज्ञान का विषय हैं, उनको समान्य बुद्धि से नहीं जाना जा सकता है । इसीलए ब्रह्माजी में भी सृष्टि करने आदि की शक्तियाँ विद्यमान रहती हैं ॥२॥ यद्यपि ब्रह्माजी नित्य हैं, फिर भी उनको औपचारिक रूप से विद्वान् लोग उत्पन्न कहते हैं । ब्रह्माजी की अपने मान से सौ वर्षों की आयु बतलायी गयी है ॥३॥ उस काल को पर के नाम से अभिहित किया जाता है, और उनकी आयु के आधे भाग को परार्द्ध कहते हैं । हे राजश्रेष्ठ ! पन्द्रह निमेषों की एक काष्ठा होती है ॥४॥ तीस काष्ठाओं की एक कला होती है और तीस कलाओं का एक मुहूर्त कहलाता है । तीस मुहूर्तो का मनुष्यों के एक दिन-रात होते हैं ॥५॥ तीस दिन-रातों का एक मास होता है और एक मास में दो पक्ष होते हैं । छह मासों का एक अयन होता है । एक वर्ष में दो अयन होते हैं दक्षिणायन और उत्तरायण ॥६।। दक्षिणायन में देवताओं की रात्रि होती है और उत्तरायण में देवताओं का दिन होता है । इस तरह मनुष्यों के एक वर्ष का देवताओं के एक दिन-रात होते हैं । देवताओं के बारह हजार वर्षो के सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग से युक्त एक चतुर्युग होता है । इन चारो युगों के काल का विभाग तुम मुझसे सुनो । इनमें कृतयुग (सत्ययुग) दिव्य चार हजार वर्षों का होता है, त्रेतायुग तीन हजार वर्षो का होता है, द्वापर युग दो हजार दिव्य वर्षों का होता है और कलियुग एक हजार दिव्य वर्षो का होता है । इसतरह से पुरातत्त्व के वेत्ता पुरुष बतलाते हैं और प्रत्येक युग के प्रारम्भ में उनकी पूर्व सन्ध्या होती है । जितने हजार वर्ष का जो युग होता है, उसकी पूर्व सन्ध्या भी उतने ही सौ वर्षो की होती है ॥७-९॥ (अर्थात् सत्ययुग की पूर्वसन्ध्या चार सौ दिव्य वर्षो की, त्रेता युग की पूर्वसन्ध्या तीन सौ दिव्य वर्षों की, द्वापर युग की पूर्वसन्ध्या दो सौ दिव्य वर्षों की और कलियुग की पूर्व सन्ध्या सौ दिव्य वर्षों की होती है ।) प्रत्येक युगों के अन्त में उनका सन्ध्यांश भी होता है । जिस युग की जितनी बड़ी पूर्व सन्ध्या होती है, उस युग का सन्ध्यांश भी उतना ही बड़ा होता है । हे नृपसत्तम 4
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