Srishti Khanda Extracted Page 40
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-40
Sanskrit Original
तस्मिन्नंडेऽ भवन्वीर सदेवासुरमानुषाः । वारिवह्नयनिलाकाशै वृतिर्भूतादिना बहिः ॥१०९॥ वृतं दशगुणैरंडं भूतादिर्महता तथा! अव्यक्तेनावृतोराजंस्तैः सर्वैः सहितो महान् ॥१९०॥ एभिरावरणैः सर्वैः सर्वभूतैश्च संयुतम् । नारिकेलफलं यद्वद्वीजं बाह्दलैरिव ॥१११॥ ब्रह्म स्वयं च जगतो विसृष्टौ संप्रवर्तते । सृष्टिं च पात्यनुयुगं यावत्कल्पविकल्पना ॥१९२॥ ससंज्ञां याति भगवानेकएव जनार्दनः। सत्वभुग्गुणवान्देवो ह्याप्रमेयपराक्रमः ॥१ ९ ३॥ तमोद्रेकं च कल्पांते रूपं रौद्रं करोतिच। राजेंद्राखिलभूतानि भक्षयत्यतिभीषणः ॥ १ ९४॥ भक्षयित्वा च भूतानि जगत्येकार्णवीकृते। नागपर्यकशयने शेते सर्वस्वरूपधृक् ॥१९५॥ प्रबुद्धश्च पुनः सृष्टि प्रकरोति च रूपधृक् । सृष्टिस्थित्यंकरणाद्ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः ॥१९६॥ स्रष्टा सृजति चात्मानं विष्णुः पाल्यं च पति च। उपसंह्वियते चापि संहर्त्ता च स्वयं प्रभुः॥९९७॥ पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाशमेव च। स एव सर्वभूतेशो विश्वरूपो यतोव्ययः ॥१२८॥ सर्गादिकं ततोस्यैव भूतस्थमुपकारकम् स एव सृज्यः स च सर्गकर्ता स एव पाल्यं प्रतिपाल्यते यतः । ब्रह्माद्यवस्थाभिरशेषमूतिर्त्रह्मा वरिष्ठो वरदो वरेण्यः ॥११९॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे पुराणवतारे द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ ओ गुना अधिक, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन भूतों द्वारा बाहर से आवृत था ॥१०९॥ ये सब दश गुने अधिक भूतादि अहङ्कार से आच्छन्न थे और वह भी अव्यक्त (प्रकृति) से आच्छादित था । राजन् वह महान् ब्रह्माण्ड इन सभी आवरणों तथा भूतों के साथ उस नारियल के फल के समान था जो ऊपर से जटा आदि से घिरा रहता है उसके भीतर उसका बीज होता है ॥११०-१११॥ ब्रह्माजी स्वयं सृष्टि का कार्य करते हैं, और उसकी रक्षा वे कल्प पर्यन्त करते हैं ॥११२॥ केवल भगवान् जनार्दन जो सत्त्वगुण के भोक्ता, विविध दिव्य गुणों से समलङ्कृत, असीम पराक्रम सम्पन्न हैं, वे ही सृष्टि आदि के कालों में ब्रह्मा आदि के नाम से अभिहित किए जाते हैं ॥११३॥ वे ही कल्प की समाप्ति की बेला में भयङ्कर रुद्र रूप को धारण करके अत्यन्त भयङ्कर बने हुए सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का भक्षण कर जाते हैं ॥११४॥ सम्पूर्ण भूतों का भक्षण करने के बाद जब जगत् एकार्णव के रूप में परिणत हो जाता है तो सम्पूर्ण जगत् शरीरक वे शेष की शय्या पर शयन करते हैं ॥११५॥ उसके बाद जब वे जगते हैं तो पुन: सृष्टि का विस्तार करते हैं । सृष्टि, पालन तथा संहार करने के कारण वे सृष्टि काल में ब्रह्मा, पालन काल में विष्णु तथा संहार काल में शिव स्वरूप होते हैं ॥११६॥ स्रष्टा रूप से वे अपनी ही सृष्टि करते है, विष्णु रूप से वे अपना ही पालन करते है, और संहारकर्ता रुद्र रूप से श्रीभगवान् अपना ही संहार करते हैं ॥११७॥ चूकि अव्यय स्वरूप वे भगवान् विश्व स्वरूप हैं, इसीलए पृथिवी, जल, तेज, वायु एवं आकाश भी वे ही हैं ॥११८॥ अतएव जीवों का उपकारक सर्गादि (सृष्टि आदि) उनके ही होते हैं वे ही सृष्टि किए जाने वाले और सृष्टि कर्ता दोनों हैं । प्रतिपालित होने के कारण वे ही पाल्य भी हैं । सम्पूर्ण जगत् शरीरक वे ही ब्रह्मा आदि की अवस्था से युक्त श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न, वर प्रदान करने वाले ब्रह्मा भी हैं ॥११९॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड का पुराणावतार नामक दूसरे अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। २।। a) |
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